राधे-राधे के उदघोष से माहौल हुआ भक्तिमय

 जौनपुर। श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ सप्ताह का आरंभ हुआ। सुबह आठ बजे बड़ी संख्या में श्रद्धालु आयोजन स्थल पर एकत्रित हुए। श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ समिति यमदग्निपुरम के तत्वावधान में श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिन शहर में स्थित गोकुल घाट पर प्रातः वैदिक मंत्रोचारण की गूंज के साथ वेदी पूजन संपन्न हुआ। जिसमे बड़ी संख्या में भक्तगणों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम स्थल पर प्रभु के नाम के जयकारे से वातावरण गुंजायमान हो गया। राधे-राधे के उदघोष से माहौल भक्ति के रस में डूब गया।  

 कथा व्यास आचार्य (डॉ.) रजनीकांत द्विवेदी जी के सान्निध्य में काशी से आए हुए आचार्यों ने वैदिक मंत्रोच्चारण से कार्यक्रम को विधिवत प्रारंभ किया। समिति के अध्यक्ष श्री शशांक सिंह 'रानू' ने सभी भक्तों को अधिक से अधिक संख्या में उपस्थिति होने हेतु आहवान किया। कथा व्यास आचार्य (डॉ.) रजनीकांत द्विवेदी जी महाराज के व्यास पीठ पर आसन होने के पश्चात् माल्यापर्ण कर,उपरणा (शाल) ओढ़ाकर स्वागत किया गया। श्रीमद् भागवत के माहात्म्य का वर्णन करते हुए आचार्य जी ने कहा कि जाने बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती अर्थात माहात्म्य ज्ञान के बिना प्रेम चिरंजीव नहीं होता, अस्थायी रह जाता है। धुंधकारी चरित्र पर प्रकाश डालते हुए आचार्य जी ने बताया कि यदि भागवत के सूत्रों को आत्मसात कर लेें तो जीवन से सारी उलझने समाप्त हो जाएगी। कुन्ती स्तुति को विस्तारपूर्वक समझाते हुए परीक्षित जन्म एंव शुकदेव आगमन की कथा सुनाई। अंत में संगीत एवं झांकी ने सबको कृष्ण रंग में सराबोर कर दिया। पश्चात गोकर्ण की कथा सुनाई गई। आचार्य जी ने कहा कि भगवान की लीला अपरंपार है। वे अपनी लीलाओं के माध्यम से मनुष्य व देवताओं के धर्मानुसार आचरण करने के लिए प्रेरित करते हैं। श्रीमदभागवत कथा के महत्व को समझाते हुए कहा कि भागवत कथा में जीवन का सार तत्व मौजूद है आवश्यकता है निर्मल मन और स्थिर चित्त के साथ कथा श्रवण करने की। भागवत श्रवण से मनुष्य को परमानन्द की प्राप्ति होती है। भागवत श्रवण प्रेतयोनि से मुक्ति मिलती है। चित्त की स्थिरता के साथ ही श्रीमदभागवत कथा सुननी चाहिए। भागवत श्रवण मनुष्य केे सम्पूर्ण क्लेश को दूर कर भक्ति की ओर अग्रसर करती है। उन्होंने अच्छे ओर बुरे कर्मो की परिणिति को विस्तार से समझाते हुए आत्मदेव के पुत्र धुंधकारी ओर गौमाता के पुत्र गोकर्ण के कर्मो के बारे में विस्तार से वृतांत समझाया और धुंधकारी द्वारा एकाग्रता पूर्ण भागवत कथा श्रवण से प्रेतयोनि से मुक्ति बताई तो वही धुंधकारी की माता द्वारा संत प्रसाद का अनादर कर छल कपट से पुत्र प्राप्ति और उसके बुरे परिणाम को समझाया। मनुष्य जब अच्छे कर्मो के लिए आगे बढता है तो सम्पूर्ण सृष्टि की शक्ति समाहित होकर मनुष्य के पीछे लग जाती है और हमारे सारे कार्य सफल होते है। ठीक उसी तरह बुरे कर्मो की राह के दौरान सम्पूर्ण बुरी शक्तियॉ हमारे साथ हो जाती है। इस दौरान मनुष्य को निर्णय करना होता कि उसे किस राह पर चलना है। छल ओर छलावा ज्यादा दिन नहीं चलता। छल रूपी खटाई से दुध हमेशा फटेगा। छलछिद्र जब जीवन में आ जाए तो भगवान भी उसे ग्रहण नहीं करते है- निर्मल मन प्रभु स्वीकार्य है। छलछिद्र रहित और निर्मल मन भक्ति के लिए जरूरी है। पहले दिन भगवान के विराट रूप का वर्णन किया गया। इसे सुन श्रद्धालु भाव-विभोर हो गए। भजन, गीत व संगीत पर श्रद्धालु देर तक झूमते रहे।श्रीमद भागवत कथा के इस पावन अवसर पर मुख्य यजमान के रूप में श्रीमती किरनलता सोनी पत्नी श्री ललित सोनी जी और श्रीमती राजरानी गुप्ता पत्नी श्री सुरेश चंद्र गुप्ता जी ने कथा का पूर्ण श्रद्धा एवं समर्पण के साथ संकल्प लिया। श्रोता के रूप मे मनोज चतुर्वेदी जी, विनोद साहू जी, विनय सेठ जी, आशीष यादव जी, शंभू गुप्ता जी, आलोक वैश्य जी, रत्नेश सिंह जी, आशा शुक्ला, रोली गुप्ता जी, दुर्गा गुप्ता जी, नीलम गुप्ता जी आदि लोग कथा का रसपान किया। व्यवस्था प्रमुख पंडित आनंद मिश्रा जी ने कोवीड प्रोटोकॉल के पालन का सार्थक प्रयास किया।

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