नाचती है शोलों पर चश्म- ए - नम में जलती है, याद- ए - अजय कुमार
जौनपुर। अजय कुमार के व्यक्तित्व, कृतित्व को क्या नाम दिया जाए, विचारक, साहित्यकार, इतिहासकार, चित्रकार यां घुमक्कड़, रहनुमा, दोस्तनवाज़ या कि बुजुर्ग साथी! उनकी स्मृति सभा में आये उनके दोस्तों और शुभचिंतकों ने अपने अनुभव जरूर बांटे लेकिन उपर्युक्त सवाल रहा. यानी वह बहुमुखी प्रतिभा वाली शख्सियत थे. अपने जीवन के दो दशक से अधिक समय उन्होंने 'वामिक जौनपुरी' की सोहबत में बिताया और उनके काम से हिंदी की दुनिया से परिचित कराय. इस दौरान उन्होंने अपनी विचारधारा से जुड़े लोगों को वामिक जौनपुरी से जोड़ने का काम किया, वामिक साहब के इंतकाल के बाद अजय कुमार उनके साथ बिताए पल के गवाह बने रहे.
जनपद हिन्दी साहित्य सम्मेलन, हिन्दी भवन जन संस्कृति मंच के बैनर तले तीन अगस्त को याद -ए - अजय कुमार के लिए शोक सभा का आयोजन हुआ. इसमें जनवादी विचारधारा से जुड़े लोगों के अलावा साहित्यकार, शिक्षाविद्, मूर्तिकार, चित्रकार, पत्रकार, शायर, समाजसेवी और उनके जीवनकाल में साथी रहे लोगों ने अजय कुमार के व्यक्तित्व, कृतित्व का वर्णन और काव्य पाठ किया.इस कार्यक्रम में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आये लोगों ने शिरकत की.
हिन्दी भवन सभागार में रविवार की दोपहर 12 बजे शुरू हुई स्मृति सभा देर शाम तक चली. अजय कुमार की चित्रकला, पेंटिंग, पोस्टकार्ड, किताबों की प्रदर्शनी लगी ताकि यहां आने वालों के जेहन में अजय कुमार की यादें ताज़ा हो सकें. अजय कुमार की तस्वीरों (पोस्टर कविता)के साथ उनकी नज़्म भी उल्लिखित थी. एक एक पोस्टर में वह कुर्सी पर बैठे पुस्तक पढ़ रहे हैं और उनकी नज़्म- मैं रहूँ या तू रहे मुझमें तू रहे या तुझमें मैं रहूँ तू रहे और तेरी बात तेरी खाक़ से मेरी जात से रहे तेरी औक़ात मैं रहूँ या न रहूँ तेरे सदके, ऐ जुनूँ....... ऐसी ही नज़्मों और यादों के साथ उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित कर स्मृति सभा का समापन हुआ.

