शाहीर मुस्तफा नकवी का मछलीशहर की सरज़मीन से उठकर हिंदुस्तान की नुमाइंदगी तक का प्रेरक सफर


शाज़िल फ़राज़ (स्थानीय इतिहास शोधकर्ता) की कलम से 

मछलीशहर (जौनपुर)। तहज़ीब, इल्म और अदब की सरज़मीन मछलीशहर हमेशा से अपनी खास पहचान रखती आई है। इसी मिट्टी ने कई ऐसे रौशन चेहरों को जन्म दिया, जिन्होंने न केवल शहर बल्कि पूरे सूबे और मुल्क का नाम बुलंदियों तक पहुँचाया। इन्हीं में से एक नाम है— शाहीर मुस्तफ़ा नक़वी, जिनका पूरा जीवन काबिलियत, मेहनत और अदबी रुझान की अनोखी मिसाल बनकर सामने आता है।

शाहीर नकवी साहब का जन्म वर्ष 1944 में मछलीशहर के मारूफ़ मोहल्ले सैयदवाड़ा में हुआ। उनके वालिद सैयद मोहम्मद मुस्तफ़ा नक़वी उर्फ़ शेरा मियां प्रतिष्ठित प्रशासनिक अधिकारी रहे, जो डिप्टी कलेक्टर के पद से सेवानिवृत्त हुए।
उनके दादा सैयद मोहम्मद नूह उर्फ़ शहीर मछलीशहरी अपने दौर के इल्मी, अदबी और रसूख़दार शख्स माने जाते थे। शहीर परिवार की नस्ल हज़रत इमाम अली नक़ी (र.अ.) और हज़रत इमाम हसन (र.अ.) की पुश्त से जुड़ती है। परिवार के बुजुर्ग 1296 से 1316 ईस्वी के मध्य सब्ज़ेवार, निशापुर (ईरान) से हिंदुस्तान आए और यहाँ ऊँचे ओहदों पर फائز रहे।

प्रारंभिक शिक्षा मछलीशहर और प्रदेश के कई शहरों में पूरी करने के बाद शाहीर नकवी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राचीन इतिहास (Ancient History) में मास्टर्स की डिग्री हासिल की।
उनकी यह डिग्री न सिर्फ़ उनके इल्मी ज़ौक़ की दलील थी, बल्कि आगे चलकर उनके पेशेवर जीवन की मजबूत नींव भी बनी।

शाहीर मुस्तफा नकवी ने अपने करियर की शुरुआत लखनऊ म्यूज़ियम में गाइड लेक्चरर के रूप में की। इसके बाद उन्होंने संग्रहालय एवं प्राचीन इतिहास विभाग में एंटीक व आर्ट ट्रेज़र रजिस्ट्रेशन ऑफिसर के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ निभाईं।

उनकी काबिलियत और अनुभव को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पर्यटन मंत्रालय (Ministry of Tourism, Govt. of India) में शामिल किया—यह उनके करियर का निर्णायक मोड़ साबित हुआ।
मंत्रालय में रहते हुए उन्होंने कनाडा और मिडिल ईस्ट में भारत का प्रतिनिधित्व किया और देश की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक मंच पर व्यवस्थित और प्रभावी रूप से प्रस्तुत किया।

लंबे, सफल और अनुकरणीय सफर के बाद वे रीजनल डायरेक्टर के पद से सेवानिवृत्त हुए।


रिटायर होने के बाद भी उनका रिश्ता शिक्षा और प्रशिक्षण से बना रहा।
उन्होंने ग्वालियर के इंस्टीट्यूट ऑफ़ होटल एंड हॉस्पिटैलिटी में डायरेक्टर के रूप में कार्य किया। साथ ही वे लखनऊ विश्वविद्यालय के एमबीए विभाग में गेस्ट लेक्चरर के रूप में भी विद्यार्थियों को मार्गदर्शन देते रहे।

उनकी कोशिशें बताती हैं कि सेवानिवृत्ति उनके लिए थकान नहीं, बल्कि समाज को ज्ञान लौटाने का दौर था।

शाहीर नकवी साहब को अदब और शायरी से खास मुहब्बत थी। वह अपने निजी डायरी में अशआर लिखा करते थे। उनका यह पहलू बताता है कि वह सिर्फ़ प्रशासकीय और पर्यटन जगत के अधिकारी ही नहीं, बल्कि एक नफ़ीस दिल और तहज़ीबी शख्सियत भी थे।

लंबी, कामयाब और सम्मानजनक जीवन बिताने के बाद शाहीर मुस्तफ़ा नकवी का 20 जून 2019 को 75 वर्ष की आयु में इंतकाल हो गया। उनके जाने से मछलीशहर और प्रदेश ने एक ऐसी हस्ती खो दी, जिसने छोटे कस्बे से उठकर पूरे भारत की नुमाइंदगी तक का सफर तय किया।

शाहीर नकवी की जिंदगी इस बात का सबूत है कि—
“इंसान कहाँ पैदा होता है, यह मायने नहीं रखता… बल्कि वह कितनी मेहनत, लगन और ईमानदारी से अपने सपनों का पीछा करता है, यही उसकी पहचान बनाता है।”

मछलीशहर की सरज़मीन से निकलकर भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय में रीजनल डायरेक्टर तक का सफर…
यह बताने के लिए काफी है कि काबिलियत की कोई सरहद नहीं होती।


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