शून्य बजट वाली प्राकृतिक खेती किसानों के लिए वरदान


 जौनपुर : कृषि विज्ञान केंद्र बक्सा में मंगलवार को कृषि विभाग द्वारा सबमिशन आंन एग्रीकल्चर एक्सटेंशन 'आत्मा' योजना अंतर्गत दो दिवसीय आवासीय कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ सुरेश कुमार कन्नौजिया ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे किसानों के लिए जीरो बजट प्राकृतिक खेती का मॉडल वरदान बनकर सामने आया है। एक देसी गाय के गोबर एवं एक नीम के वृक्ष से 30 एकड़ खेत में बंपर फसल पैदा की जा सकती है गाय के गोबर से बना जीवामृत फसलों के लिए अमृत है। रासायनिक खेती की तुलना में फसल का उत्पादन भी अधिक होता है, उन्होंने कहां कि

पूरी तरह से प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल से की जाने वाली खेती को जैविक खेती कहा जाता है। जैविक खेती केवल फसल उत्पादन तक सीमित नहीं है वरन पशुपालन में भी यदि पशुओं को भोजन और दवाइयां इत्यादि प्राकृतिक रूप से उपलब्ध संसाधनों से प्रदान की जाएं तो ऐसे पशुओं के उत्पाद भी जैविक पशु उत्पाद कहलाते हैं। जब जैविक कृषि उत्पादन की बात करते हैं तो इसका अर्थ यह होता है कि कृषि उत्पादन के लिए जिन संसाधनों यथा ( खाद, कीटनाशक इत्यादि) का उपयोग हो वे सभी प्राकृतिक रूप से ही बने होनी चाहिए इसके लिए गर्मी में गहरी जुताई, बीज शोधन, खरपतवार नियंत्रण, मल्चिंग, पौधों को पोषण गोबर की खाद, हरी खाद, वर्मी कंपोस्ट, पीएसबी कल्चर, माइकोराइजा, राइजोबियम, फसल चक्र का पालन,कीट एवं रोग नियंत्रण हेतु जैविक रोगनाशक/कीटनाशक ट्राइकोडर्मा, ब्यूवेरिया बेसियाना का प्रयोग करें। 
बीजामृत तैयार करने की विधि - 
 पांच किलो ताजा गाय का गोबर लेकर एक कपड़े की थैली में रखकर एक पात्र में रख दें और पात्र को पानी से भर दे इससे गोबर में विद्यमान सारे तत्व छनकर पानी में आ जाएंगे। दूसरे पात्र में 50 ग्राम चूना लेकर एक लीटर पानी में मिलाएं। 12 से 16 घंटे बाद कपड़े की थैली को दबाकर निचोड़ लें और गोबर अंक के साथ पांच लीटर गोमूत्र मिला दे, 50 ग्राम जंगल की शुद्ध मिट्टी, चुने का पानी और 20 लीटर सादा पानी भी मिला दे। 8 से 12 घंटों तक इस मिश्रण को छोड़ दीजिए इसके पश्चात पूरा मिश्रण छान लें। छना हुआ मिश्रण बीज उपचार के लिए उपयोग करें।
जीवामृत तैयार करने की विधि - 
दश किग्रा गाय का गोबर +10 लीटर गोमूत्र + 2 किग्रा.गुण तथा एक किग्रा किसी दाल का आटा+  एक किग्रा जीवंत मृदा को 200 लीटर जल में मिलाकर पांच से सात दिनों हेतु सड़ने दे। नियमित रूप से दिन में तीन बार मिश्रण को हिलाते रहे। एक एकड़ क्षेत्र में सिंचाई जल के साथ प्रयोग करें। कार्यक्रम की अध्यक्षता उद्यान वैज्ञानिक डा. राजीव सिंह तथा संचालन उप परियोजना निदेशक आत्मा डॉ रमेश चंद्र यादव ने किया इस मौके पर त्रिभुवन सिंह, राजनाथ, अनिल कुमार, जुनेद अहमद, प्रमोद उपाध्याय, ज्ञानेश्वर मिश्र, साधना, दुर्गा मौर्या आदि सैकड़ों किसान मौजूद रहे।

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