घोसी में शर्मनाक हार: क्या भाजपा बदलेगी दलबदलुओं को लेकर रणनीति?

 

शिवपाल की अगुवाई में एक बार फिर अखिलेश को मिली बड़ी खुशी

अजय कुमार
उत्तर प्रदेश के मऊ जिले की घोसी विधानसभा सीट के लिए बीते 5 सितंबर को हुए उपचुनाव के नतीजे ने भारतीय जनता पार्टी को तगड़ा झटका दिया है। घोसी में बीजेपी ने पूरी ताकत लगा दी थी। यहां जीत के लिए बीजेपी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित 40 स्टार प्रचारकों की फौज उतार दी थी। इसके अलावा भी बीजेपी के कई बड़े नेता और मंत्री चुनाव प्रचार के दौरान यहां डेरा डाले रहे थे। फिर भी वह चुनाव के नतीजे नहीं बदल पाये।इस हार की धमक दिल्ली तक सुनाई दे रही है। बीजेपी को यहां हार ही नहीं मिली है, उसे शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा है। बीजेपी के लिए यह हार इसलिए भी मायने रखती है, क्योंकि अब यूपी में कोई चुनाव नहीं होना है और इस जीत के सहारे विपक्ष बीजेपी को लगातार आईना दिखाती रहेगी। उधर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव जो लगातार घोसी उपचुनाव को आईएनडीआईए बनाम एनडीए के बीच का मुकाबला बनाने में लगे थे जिसमें उन्हें बड़ी सफलता हाथ लगी है। सबसे बड़ी बात यह है कि समाजवादी पार्टी ने भी बीजेपी की तरह घोसी उपचुनाव को नाक का सवाल बना लिया था। सपा के कई दिग्गज यहां चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे थे परंतु यहां सबसे अधिक मेहनत और सफल रणनीति शिवपाल यादव ने बनाई थी। शिवपाल यादव की अगुवाई में समाजवादी पार्टी ने यहां दूसरा महत्वपूर्ण चुनाव जीता है।
गौरतलब हो कि समाजवादी पार्टी में वापसी के बाद मैनपुरी लोकसभा उपचुनाव के दौरान शिवपाल यादव पार्टी के लिए पहली बार सक्रिय हुए थे। करीब एक दशक पुरानी अखिलेश से रंजिश को भुलाकर परिवार एक हुआ तो मैनपुरी में सपा को विशाल जीत मिली। मुलायम के निधन के बाद खाली हुई सीट पर डिंपल यादव जीतकर लोकसभा पहुंचीं। शिवपाल को ईनाम के तौर पर सपा का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया। अखिलेश की कोर टीम में शामिल शिवपाल अपनी राजनीतिक जमीन और रसूख का प्रदर्शन करने के लिए जब घोसी के मैदान में उतरे, उस समय हवा बीजेपी के पक्ष में दिखाई दे रही थी, मगर इससे बेफिक्र शिवपाल ने घर-घर प्रचार किया और मैनपुरी लोकसभा सीट की तर घोसी विधानसभा की सीट भी सपा की झोली में डाल दी। निश्चित ही इस जीत से शिवपाल का पार्टी में रसूख और बढ़ेगा। अखिलेश को भी यह मानना पड़ेगा कि चुनावी रणनीति बनाने में शिवपाल यादव का आज भी पार्टी के भीतर कोई तोड़ नहीं है। वहीं घोसी में बीजेपी को मिली हार के बाद बीजेपी के साथ सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेता ओम प्रकाश राजभर की प्रतिष्ठा को भी जबर्दस्त धक्का लगा है। घोसी में बीजेपी को मिली हार के बाद ओम प्रकार राजभर के मंत्री बनने के सपने पर भी ग्रहण लग सकता है।
वैसे यहां यह जान लेना जरूरी है कि घोसी विधानसभा क्षेत्र को सपा का मजबूत गढ़ माना जाता है। पिछले वर्ष हुए विधानसभा चुनाव में घोसी से समाजवादी पार्टी के टिकट से दारा सिंह चौहान जीते थे। उन्हें उम्मीद थी कि समाजवादी पार्टी की प्रदेश में सरकार बनेगी परंतु जब योगी के सिर जीत का सेहरा बंधा तो उनका दिल सपा में लगना बन्द हो गया और बाद में दारा सिंह पाला बदलते हुये विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर बीजेपी में आ गये। बीजेपी ने उन्हें टिकट तो दे दिया लेकिन वह दारा सिंह के लिए जीत का मार्ग नहीं प्रश्स्त कर पाई। बीजेपी को समझ लेना चाहिए कि जनता इतनी बेवकूफ नहीं है जितना उसे समझा जाता है। वैसे भी 2017 के बाद अब तक घोसी विधानसभा के लिए 6 बार चुनाव-उपचुनाव होना जनता को रास नहीं आ रहा था। इसी वजह से यहां वोटिंग परसेंट भी कम रहा था। समाजवादी पार्टी के लिए घोसी से यह भी अच्छी खबर आई है कि अभी भी मुसलमान वोटर उसके साथ मजबूती के साथ खड़ा हुआ है।
घोसी में हुए उपचुनाव में दारा सिंह चौहान को भाजपा के सहयोगी दलों अपना दल (सोने लाल), निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल (निषाद) पार्टी और पूर्व सपा सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का समर्थन मिला था तो दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार सुधाकर सिंह को विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के घटक दलों कांग्रेस, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल, आम आदमी पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) (भाकपा-माले)-लिबरेशन और सुहेलदेव स्वाभिमान पार्टी से समर्थन मिला था।
घोसी में मिली जीत से आईएनडीआईए गठबंधन में खुशी का माहौल है तो समाजवादी पार्टी भी गढ़ है। ऐसा होना स्वभाविक भी है। समाजवादी पार्टी घोसी की जीत का जश्न लोकसभा चुनाव तक मनाने और इसे भुनाने की कोशिश में लगी रहेगी। सपा को मिली इस जीत का मैसेज बीजेपी के है लेकिन चौकाने वाली बात यह भी है कि घोसी में मिली हार के बाद भारतीय जनता पार्टी के कुछ पुराने नेता और जमीनी कार्यकर्ता भी दबी जुबान से बीजेपी को आईना दिखाने में लगे हैं। सवाल यह किया जा रहा है कि क्या बीजेपी के भीतर नेताओं की कमी थी जो एक दलबदलू दारा सिंह चौहान को उम्मीदवार बनाया गया। वोटरों ने भी संभवत: दारा सिंह चौहान को इसीलिए ठुकरा दिया है, क्योंकि उन्होंने अपनी विचारधारा को तिलांजिल दे दी है। वोटरों ने चाहे-अनचाहे बीजेपी आला कमान को भी आईना दिखाने की कोशिश की है कि जब प्रदेश में पूर्ण बहुमत वाली योगी सरकार सुगमतापूर्वक काम कर रही है तो बार-बार दलबदलू नेताओं को पार्टी में शामिल करना और उन्हें चुनाव मैदान में उतारने की क्या जरूरत है? इससे जनता का पैसा और समय दोनों बर्बाद होते हैं।
बहरहाल घोसी की हार ने बीजेपी को यह भी बता-समझा दिया है कि यदि उसे चुनावी जंग जीतनी है तो उसे अपने रणबांकुरों को ही मैदान में उतारना होगा, उन्हीं पर भरोसा करना होगा, अन्यथा दारा सिंह चौहान जैसे उसके बाहरी प्रत्याशी उसके लिए मुसीबत का ही सबब बनते रहेंगे। घोसी की हार के बाद बीजेपी की रणनीति में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। हो सकता है कि अब आम चुनाव में बीजेपी ऐन मौके पर पार्टी में आकर टिकट हासिल करने वाले नेताओं से दूरी बनाकर चले।

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