खून-खराबा किसी के लिए है खेल-खिलौना, मगर मेरी तहजीब अलग है

 

ऐ! दुनिया वालों (नज़्म)

खून-खराबा किसी के लिए है खेल-खिलौना,
मगर मेरी तहजीब अलग है।
कोई बोता है नफरतों का बीज,
पर मेरी तहजीब अलग है।

हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन,
पारसी, यहूदी, सभी हैं मेरे अपने,
हम हैं एक डाल के फूल, गमकने दो बहारों में,
मेरी तहजीब अलग है।

सियासतें तो होती हैं खून की प्यासी, इतिहास गवाह है देखो,
लेकिन हमारे खून में है अमन, शान्ति, भाईचारा,
क्योंकि मेरी तहजीब अलग है।

ऐ! दुनिया वालों कुछ नहीं बचेगा अगर तुम ऐसे लड़ते रहोगे,
ऐसा पागलपन का दौरा नहीं है हमारे जींस में,
क्योंकि मेरी तहजीब अलग है।

शहर का शहर हो गया खंडहर, देखो अभी तक आग नहीं बुझी,
हम नहीं चाहते कोई वर्षों-बरस मनाये सोग,
मेरी तहजीब अलग है।

जंग लड़नी है, तो बेरोजगारी, महंगाई, भुखमरी से लड़ो,
हम हैं वसुधैव कुटुम्बकम वाले, पढ़ो मेरी आत्मा,
मेरी तहजीब अलग है।

रामकेश एम. यादव, मुम्बई
(कवि व लेखक)

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