अखिलेश की प्रभु श्रीराम से दूरी, अन्सारी बन्धुओं से चिरौरी


संजय सक्सेना

समय और जरूरत के हिसाब से राजनेताओं को अपना चाल-चरित्र-चेहरा बदलने हुए देखना भले ही देश की जनता को अच्छा नहीं लगता हो लेकिन नेताओं को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है, क्योंकि वह जानते हैं कि जनता की याद्दाश्त काफी कमजोर होती है, वह कोई बात ज्यादा समय तक याद नहीं रखती हैं इसी का फायदा हमारे नेता उठाते हैं। आज की तारीख में आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री इसकी सबसे बड़ी मिसाल हैं। जनता दल युनाइटेड के नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार को तो पलटूराम तक की संज्ञा दी जाती है। इस कड़ी में समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव का नाम भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है। आज जो समाजवादी नेता भले राम नाम की माला जब रहे हों लेकिन उनकी पार्टी का दामन कारसेवकों के खून से सना हैं, यह बात भी भूली नहीं जा सकती है। अखिलेश की सियासत भी ऐसे ही नजर आ रही है जिसको लेकर बीजेपी तो उन पर हमलावर है ही। सपा के साथ खड़े दलों के नेता भी अखिलेश को आईना दिखा रहे हैं।
हाल ही में समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव का असली चेहरा एक बार फिर सामने आ है। वह लगातार प्रोपोगंडा फैला रहे थे कि उन्हें 22 जनवरी के लिए निमंत्रण नहीं मिला है लेकिन अब हकीकत सामने आ गई है कि रामलला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह में अखिलेश को निमंत्रण भेजा गया था लेकिन उन्होंने परोक्ष रूप से निमंत्रण अस्वीकार्य कर दिया था परंतु इस बात को वह खूबसूरती के साथ छिपा गये. अब डैमेज कंट्रोल में लगे अखिलेश कहते हैं कि हम जिन्हें जानते नहीं हैं, उन्हें न निमंत्रण देते हैं और न ही उनसे कोई निमंत्रण स्वीकार करते हैं। अखिलेश नहीं जाना चाहते हैं, यह उनकी मर्जी है परंतु उनको इसके लिए झूठ का सहारा नहीं लेना चाहिये था। इसको लेकर बीजेपी तो लगातार अखिलेश पर तंज कस ही रही है। अब तो कांग्रेस भी अखिलेश पर हमलावर हो गई है। अखिलेश यादव की इस कृत्य पर कांग्रेस नेता आचार्य प्रमोद ने सोशल मीडिया हैंडल एक्स पर लिखा है कि राम नाम से इतना बैर ठीक नहीं है अखिलेश यादव जी। जाते या न जाते, निमंत्रण तो न ठुकराते।
बता दें कि सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्या लगातार हिंदू विरोधी टिप्पणी करते आ रहे हैं। उनकी टिप्पणियों से सनातन धर्म को मानने वाले लोग आहत हैं लेकिन अब तक अखिलेश यादव की ओर से कोई कार्रवाई नहीं की गई, बल्कि कहीं न कहीं वह भी स्वामी प्रसाद के पदचिन्हों पर चलते नजर आ रहे हैं। कांग्रेस नेता आचार्य प्रमोद ने कहा कि समाजवादी पार्टी प्रमुख और स्वामी प्रसाद मौर्य की कहानी विक्रम-बेताल की तरह है। स्वामी प्रसाद मौर्य का भूत अखिलेश यादव के ऊपर चढ़कर बैठ गया है। सच तो यह है कि अखिलेश यादव स्वामी प्रसाद मौर्य से डरते हैं। वह जानते हैं कि मौर्य भाजपाई हैं और उनके बयानों से उनकी पार्टी (सपा) को हर दिन नुकसान हो रहा है और उसे खत्म किया जा रहा है। कांग्रेस नेता ने आगे कहा कि वह जानते हैं कि अगर स्वामी प्रसाद मौर्य इसी तरह बोलते रहे तो भाजपा को कोई नहीं रोक सकता। यह समाजवादी पार्टी के लिए घातक साबित होगा। अगर वास्तव में बीजेपी को चुनौती देनी है, अगर नरेंद्र मोदी को चुनौती देनी है, 2024 के चुनाव में उन्हें राहुल गांधी के नेतृत्व में आना होगा।”
अब तो अखिलेश प्रभु राम की जगह पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) को अपना भगवान बताने लगे हैं। वहीं सपा दफ्तर के बाहर भगवान राम की होर्डिंग लगी हैं जिसमें अयोध्या में बन रहे राम मंदिर की तस्वीर है और लिखा हुआ है आ रहे हैं हमारे आराध्य प्रभु श्रीराम। इसे सपा युवजन सभा के पूर्व सचिव आशुतोष सिंह ने लगाया है। इसमें अखिलेश यादव की तस्वीर भी लगी हुई है। सपा में आजकल जो कुछ चल रहा है, उसके आधार पर यह भी कहना अनुचित नहीं होगा कि सपा में बड़ी फूट नजर आ रही है जो पार्टी की टूट का कारण भी बन सकती है।
एक तरफ अखिलेश को 22 जनवरी को अयोध्या जाने से परहेज है तो दूसरी तरफ उन्हें एक सजायाफ्ता बसपा नेता अफजाल अंसारी के यहां जाने में कोई गुरेज नहीं है। गत दिनों बीएसपी सांसद अफजाल अंसारी की सबसे छोटी बेटी नूरिया अंसारी के शादी समारोह में वह तुष्टिकरण की सियासत चमकाने पहुंच जाते हैं। अफजाल अंसारी के यहां समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और महासचिव शिवपाल यादव के साथ ही बड़ी संख्या में एसपी के विधायक और अन्य नेताओं ने हिस्सा लिया लेकिन अयोध्या जाने से उन्हें गुरेज है। उनके नेता प्रभु राम के मंदिर निर्माण को फिजूलखर्ची बताते हैं लेकिन हज निर्माण से कभी गुरेज नहीं होता है। बहरहाल अंसारी परिवार से सपा की बढ़ती यह नजदीकी लोकसभा चुनाव से पहले यूपी में नए सियासी गठजोड़ का संकेत दे रही है।

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