कच्चे घर गिन रहे हैं आखिरी सांसें, क्या कभी उल्टे पांव लौटेगा जमाना ?

 

जौनपुर। जनपद के ग्रामीण इलाकों में कच्चे घर अब बहुत ही कम संख्या में रह गये हैं और शहरी इलाकों में इनकी संख्या नगण्य रह गई है। क्या बदलते जमाने में  कभी इनके दिन बहुरेंगे ? यह प्रश्न सीधे-सीधे देखने पर महत्वहीन जैसा महसूस होता है लेकिन जैसे ही हम रासायनिक उर्वरकों की करीब पचास साल की यात्रा के पश्चात जैविक उर्वरकों की ओर  या गेहूं और चावल के अंधाधुंध उपयोग के पश्चात अब मोटे अनाज की ओर लौटने की बात  करते हैं तो थोड़ा सा कच्चे मकानों की  भी प्रासंगिकता बदले दौर में महसूस होने लगती है। क्योंकि नब्बे के दशक में जैविक खेती और मोटे अनाज का पक्षधर होने वाले व्यक्ति को पिछड़ी मानसिकता का व्यक्ति माना जाता था। सीधे-सीधे शब्दों में कहें तो पन्द्रह से बीस साल पहले हमनें जैविक खेती और मोटे अनाज पर जितनी थू-थू की थी उसी को आज हम चाट रहे हैं। ऐसा ही कुछ कच्चे मकानों का भी भविष्य है।पक्के मकानों का फ़ैशन अभी पीक पर नहीं पहुंचा है इसलिए प्रथम दृष्टया यह बात खारिज करने जैसी लगती है लेकिन अगले पंद्रह से बीस वर्षों बाद इन मकानों की प्रासंगिकता फिर से मोड़ लेगी। इन्हें कुछ परिवर्तित स्वरूप में पक्के मकानों के बड़े-बड़े अहातों में स्थान जरुर मिल सकता है। कच्चे मकानों की सबसे बड़ी समस्या बारिश और तूफान के समय गिरने तथा अलग- अलग जरूरतों के लिए स्मार्ट कक्ष का न होना था लेकिन कच्चे मकानों का सबसे अधिक भविष्य इनके थर्मल इंसुलेशन बनावट को लेकर है।जो हमें हर मौसम में थर्मल कम्फर्ट प्रदान करते हैं।पक्के मकानों को वातानुकूलित बनाय रखने के लिए हम जितने भी कृत्रिम प्रयास कर रहे हैं उनसे किसी न किसी प्रकार से हमारे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।पंखा,ए सी , ब्लोअर से होने वाले नुकसान हो या मिट्टी से दूरी, प्राकृतिक रोशनी में कम समय बिताने की समस्या हो या बच्चों की घटती आउट डोर एक्टिविटी सबमें कच्चे घरों की प्रासंगिकता अधिक सार्थक लगती है।यह विकास खंड मछलीशहर के गांव बामी का दृश्य है। घर के मालिक राधेश्याम यादव अब दो मंजिला पक्के घर में रहते हैं।वे कहते हैं कि इस घर से उनकी बहुत सारी यादें जुड़ी हुई हैं। कच्चे मकानों के भविष्य को लेकर गांव के ही जितेन्द्र बहादुर सिंह कहते हैं कि कच्चे मकानों का भविष्य अब पुराने दौर की तरह वापस नहीं आने वाला है लेकिन आज की पीढ़ी पक्के मकानों के कारण जिन स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रही है। कुछ दिनों बाद बड़े-बड़े अहातों में इन्हें पक्के मकानों के पूरक के रूप में देखा जायेगा और एक बैठके के रूप में ही सही स्थान जरुर मिलेगा। शहरी इलाकों में जगह की शार्टेज है यहां इसके लिए भले जमीन न मिले लेकिन ग्रामीण इलाकों में बड़े मकानों के अहाते में जगह जरूर मिलेगी। वर्तमान समय में भी बहुत लोगों के मन में यह विचार आता है लेकिन वे ऐसा करने से इसलिए हिचक रहे हैं कि कच्चा मकान छोटी आय और पिछड़ी मानसिकता का प्रतीक है। जैविक उर्वरकों और मोटे अनाज की ही तरह इनके भी फायदे समाज में गिनाये जायेंगे लेकिन अभी थोड़ा वक्त लगेगा।

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