471 साल से काशी में हो रही है ये अद्भुत लीला, देखने के लिए उमड़ते हैं लाखों भक्त

 वाराणसीदशहरे के दूसरे दिन नाटी इमली के मैदान में लक्खा मेला यानि भरत मिलाप का आयोजन होता है। 471 साल से शाम चार बजकर चालीस मिनट पर अस्त होते हुए सूरज की किरणें मैदान के एक निश्चित स्थान पर पड़ती है, पांच मिनट के लिए सारा माहौल बदल जाता है। राम, लक्ष्मण और सीता को दंडवत प्रणाम करने के लिए भरत और शत्रुघ्न दौड़ पड़ते हैं। भगवान राम दोनों भाइयों को पहले गले लगाते हैं और फिर भक्तों को दिव्य दर्शन देते हैं। इस लीला को देखने के लिए एक लाख से ज्यादा भक्त मैदान के अंदर और बाहर जमा होते हैं। दोपहर से ही लाखों की संख्या में भक्त मैदान में पहुंचने लगते हैं। काशी नरेश के बिना लीला शुरू नहीं होती है।
ऐसी मान्यता है कि संत तुलसीदास जी के शरीर त्यागने के बाद उनके समकालीन संत मेधा भगत काफी परेशान हो गए थे। उसके बाद तुलसीदास जी ने उन्हें सपने में दर्शन दिए थे। वहीं से प्रेरणा लेकर उन्होंने इस रामलीला की शुरुआत की और तब से लेकर आज तक ये परंपरा चली आ रही है। महंत ज्ञानेश्वर पांडेय ने बताया कि दशहरे के दूसरे दिन यानि के एकादशी पर भरत मिलाप की लीला काशी में होती है। इस दिन देवलोक के सारे देवगण महादेव की नगरी में विराजमान होते हैं।
महंत ज्ञानेश्वर पांडेय ने बताया कि मान्यताओं के अनुसार भगवान राम के साथ लक्ष्मण और सीता भी उपस्थित रहते हैं। तुलसीदास जी ने यहां के घाटों पर ही रामचरितमानस की रचना की थी। इसके बाद उन्होंने इन्हीं घाटों पर कलाकारों को इकट्ठा करके रामलीला करना शुरू कर दिया था, लेकिन इस परंपरा को मेधा भगत ने आगे बढ़ाया। उन्होंने एक चबूतरे पर भगवान राम के दर्शन किए थे। तभी से काशी में भरत मिलाप का सिलसिला शुरू हो गया। आगे चलकर इस मेले को लक्खी मेला कहा गया।

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