मुहर्रम के महीने में होने वाली मजलिसें देती हैं दुनिया को मानवता का सन्देश : एस एम् मासूम

 

मुहर्रम ला चाँद होते ही पूरी दुनिया में पैगम्बर ऐ इस्लाम के नवासे इमाम हुसैन के चाहने वाले उनको  श्रद्धांजलि देने के लिए उनकी शहादत को याद करने के लिए और उनका दिया इंसानियत का पैग़ाम दुनिया तक पहुंचाने के लिए अपने घरों में इमामबाड़ों में अलम ,ताज़िया ,सजा देते है और जगह जगह मजलिसें करते और इमाम हुसैन पे उस दौर के आतंकवादी , विश्व विजय का शौक़ रखने वाले यज़ीद द्वार्रा किये गए  ज़ुल्म को याद करकेआंसू बहाते हैं | इस याद में सबसे अधिक अहमियत मजलिस को दिया जाता है और यह समझने के लिए की कैसे यह मजलिसें ,अलम ताज़िये का जुलुस इंसानियत का पैगाम देता है हमें यह समझना होगा की यह मजलिसें, अलम ,ताज़िये क्या है ? 

मजलिस क्या है ? 
आज से 1445 साल पहले 61 हिजरी में कर्बला इराक़ में पैगम्बर ऐ इस्लाम हज़रत मुहम्मद (स ) के नवासे इमाम हुसैन को उनके साथियों और रिश्तेदारों के साथ तीन दिन का भूखा पयासा ज़ालिम यज़ीद की फ़ौज ने शहीद कर दिया और औरतों बच्चों पे ज़ुल्म किया और तब से इमाम हुसैन के चाहने वाले मजलिसों में लोगों को एकत्रित कर के ज़ालिम यज़ीद के इमाम हुसैन पे किये ज़ुल्म को बयान करते हैं और यह दुनिया को बताते हैं ज़ुल्म करना इस्लाम नहीं बल्कि अमन और शान्ति का रास्ता अपनांना और सब्र करना इस्लाम है | 

इस प्रकार अगर आसान भाषा में समझा जाय तो इन मजलिसों को आप शोक सभा भी कह सकते हैं | इन मजलिसों में एक धर्म गुरु या ज़ाकिर (कर्बला के वाक़ए का जानकार ) होता है जिसको ख़ास तौर से शोक सभा करने वाला बुलाता है ,वो मिम्बर पे बैठ के कर्बला में इमाम हुसैन और उनके परिवार पे हुए ज़ुल्म और उनकी शहादत को बायां करता है और हुसैन के चाहने वाले सामने बैठ के आंसू बहाते हैं | 

1400 से अधिक सालों से यह सिलसिला चला आ रहा जो हुसैन के चाहने वालों को यह सिखाता रहता है की ज़ुल्म का धर्म से कोई रिश्ता नहीं और इंसानियत ही असल धर्म है और जो इस उसूल को मानता है वही सच्चा मुसलमान कहलाता है | पहले यह मजलिसें मस्जिदों और ख़ानक़ाहों में हुआ करती थी और इसमें मर्सिया पढ़ा जाता था लेकिन धीरे धीरे इनका अंदाज़ बदलता गया और इमामबाड़े बनने लगे जहां हर धर्म के लोगों का स्वागत होता था और मर्सिया पढ़ने वाले  लोगों को कर्बला में हुए ज़ुल्म की दास्ताँ सुनाते थे और सब मिल के आंसू बहाते और इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों को श्रधान्जनी दिया करते थे | 

जौनपुर में इन इमामबाड़ों का चलन फ़िरोज़ शाह तुगलाक के अंतिम दौर से शुरू हुआ और वे इमामबाड़े आज भी मौजूद है और इनमे मजलिसें साल भर होती हैं जिसमे हर धर्म के लोगों को बुलाया जाता है और अनगिनत दूसरे धर्म के लोग भी मजलिसों का आयोजन करते हैं | 

जिनके पास दौलत थी या बादशाहत थी और इमाम हुसैन के चाहने वाले भी थे वे इस माह ऐ मुहर्रम में कर्बला इमाम हुसैन के रौज़े की ज़ियारत को जाय करते थे लेकिन कई बार ऐसा हुआ की बादशाह या चाहने वाले कर्बला मुहर्रम में नहीं जा सके तो उन्होंने कर्बला इमाम हुसैन के रौज़े की नक़ल बना ली और इस तरह तुर्बत , ताज़िया अलम का चलन शुरू हुआ जो आज आपको अज़ादारी के जुलुस और इमामबाड़ो में पूरी दुनिया में दिखाई देगा |

आज इन जुलूसों में इमाम हुसैन के चाहने वाले उनपे हुए ज़ुल्म का नौहा (दुःख भरा काव्य) पढ़ते हुए मातम करते हुए हाथ में इमाम हुसैन के भाई अब्बास अलमदार का अलम हाथों में उठाय और अपने कन्धों पे इमाम हुसैन की तुर्बत (इमाम हुसैन की कब्र की नक़ल ) , इमाम हुसैन के 6 महीने के शहीद बच्चे का झूला , इत्यादि निशानियां उनको याद करने के लिए और दुनिया को उनपे हुए ज़ुल्म को बताने के लिए साथ ले के चलते नजर आएंगे और ऐलान करते नज़र आएंगे की हम ज़ालिम का साथ नहीं देते बल्कि हम अमन और शांति की राह पे चलने वाले और ज़ुल्म को मिटाने वाले इमाम हुसैन के चाहने वाले हैं |
लेखक
एस एम् मासूम  

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