चांद आज भी सबको निहारता है लेकिन चांद को निहारने की फुर्सत नहीं रही

 

जौनपुर। बच्चों की कहानियों और कविताओं में चांद की चर्चा आज भी शुरुआती कक्षाओं की किताबों में भरी पड़ी है। हिंदी फिल्मों में आज भी बार बार गानों में चांद का जिक्र आता है। मेट्रो शहरों में मल्टीस्टोरी बिल्डिंग तेज रोशनी और वायु प्रदूषण के चलते अब तो चांद का दीदार मुश्किल है लेकिन ग्रामीण इलाकों में आज भी खिली चांदनी में चांद को देखने का सुकून गजब का है। बृहस्पतिवार की रात मछलीशहर के ग्रामीण इलाकों में चैत्र मास की पूर्णिमा पर खिली चांदनी में चांद का दृश्य सुन्दर और मनमोहक है। एक दौर था जब बच्चे चांद को चंदा मामा कहते थे। मां से बालक की फरमाइश कुछ इन शब्दों में हुआ करती थी-

मैया, मैं तो चंद - खिलौना लैहों।जैहों लोटि धरनि पर कहीं,तेरी गोद न ऐहौं

अब के दौर में सबसे बड़ा खिलौना मोबाइल ही रह गया माता पिता से बच्चे सबसे ज्यादा जिद मोबाइल अपने हाथ में लेने की करते हैं।मोबाइल हाथ लगी तो समय स्क्रीन की लत में बीत जाता है। युवाओं की जिंदगी तो चकाचौंध भरी है जिसमे चांद को निहारने की फुर्सत किसे कहां है।

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