गरीबी में की पढ़ाई, अब गरीब बच्चों के मसीहा बने हैं गुरू जी

 

जौनपुर। विद्यार्थी जीवन की गरीबी राम अभिलाष पाल (गुरु जी) को गरीब छात्रों के मसीहा बनने की प्रेरणा प्रदान किया। विगत 30 वर्षों से उनके सानिध्य में रहकर हजारों छात्र-छात्राएं देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी उच्च पदों पर आसीन होकर पूरी कर्तव्यनिष्ठा के साथ अपनी सेवाएं देे रहे हैं। इसका पैतृक आवास ग्राम बेलासन पोस्ट कोल्हुआ तहसील बदलापुर है तथा हाल निवास और कार्यक्षेत्र ग्राम सराय युसुफ पोस्ट व तहसील मछलीशहर है। 

मालूम हो कि राम अभिलाष पाल गुरुजी जूनियर हाईस्कूल की परीक्षा पास करने के बाद घर से लगभग 12 किलोमीटर दूर स्थित विद्यालय में प्रवेश लिये। कक्षा 9 में खराब कपड़ों की वजह से विद्यालय से बाहर निकाल दिए गए। इस घटना से वे बहुत दुखित हुए और उन्होंने संकल्प लिया कि मैं शिक्षक बनूंगा और गरीब छात्रों को आगे बढ़ाने में और उत्कृष्ट राष्ट्र सेवा के लिए उन्हें प्रेरित करूंगा। 
इसी धारणा के बाद 1990 से शिक्षण कार्य करते हुए विद्यालय समय से पहले और बाद में सीमित संसाधनों से वृक्ष के नीचे जमीन पर बैठाकर शिक्षा दान करने लगे। यह प्राचीन गुरुकुल परंपरा का जीवंत उदाहरण है। इसका परिणाम यह हुआ कि आज हजारों छात्र-छात्राएं देश और विदेश में अतुलनीय राष्ट्र सेवा प्रदान कर रहे हैं। क्षेत्र में राम अभिलाष पाल गुरु जी के नाम से जाने जाते हैं। विगत वर्ष राष्ट्र को समर्पित सभी शिष्यों ने गुरु कृपा कृतज्ञता उत्सव का आयोजन करके गुरु जी को कार उपहार स्वरूप भेंट किये। सभी छात्र इन्हें अपना आदर्श मानते हैं। गुरुजी गरीब छात्रों को न केवल अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराते हैं, बल्कि कपड़ा, साइकिल, ठंडी के दिनों में कपड़े भी उपलब्ध करते हैं। उनके इस पुनीत कार्य में समर्थ शिष्य इंजीनियर, डाक्टर, प्रशासनिक अधिकारी, प्रोफेसर, प्रवक्ता, सीएमडी, सीईओ शिक्षक, पत्रकार, अधिवक्ता, रेलवे कर्मचारी इत्यादि पदों पर आसीन सफल शिष्य गुरु जी के मिशन को आगे बढ़ाने में आर्थिक ढंग सहयोग कर रहे हैं। इनके शिष्य गुरुकुल आश्रम में आकर छात्रों को ऊंची सफलता के लिए प्रेरित करते हैं एवं उनमें राष्ट्र प्रेम जागृत करते हैं। शिक्षक एवं छात्रों के बीच संबंधों की एक अनूठी मिशाल गुरु जी ने प्रस्तुत किया है। उनका लक्ष्य है कि धनाभाव में कोई छात्र शिक्षा से वंचित न रहने पाए। कोरोना काल में भी गुरु जी ने गरीबों और असहायों की मदद में बढ़कर हिस्सा लिया। गुरु जी की सोच है कि इस जंजीर रूपी राष्ट्र के लिए कड़ी रूपी नागरिक जितने मजबूत होंगे, राष्ट्र उतना ही शक्तिशाली होगा। ऐसे में वे राष्ट्र की कमजोर कड़ी को शिक्षा के माध्यम से मजबूत बनाकर राष्ट्र की शक्तिशाली बनाने का संकल्प लेकर अपने मिशन को आगे बढ़ा रहे हैं। इस महत्वपूर्ण मिशन पर कार्य करते हुए इन्होंने कभी अपने कार्य को प्रकाश में लाने का प्रयास नहीं किए बिना किसी दिखावा के अपने मिशन पर निष्ठापर्वक कार्य करते रहे। जब इनके शिष्य इनके मार्गदर्शन एवं सहयोग से सफलता के शीर्ष पर आसीन हुए तो गुरु जी के इस महत्वपूर्ण राष्ट्र समर्पित कार्य को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए भारत सरकार से पद्म अवार्ड की मांग कर रहे हैं। इनकी विशेष पहचान यह है कि इनके सामान्य से उच्च पदों पर आसीन शिष्य गुरु जी के सामने वाहन से उतरकर ही अभिवादन करते हैं। यह उनके साथ एक विशेष सम्मान का बोध है। जो आज के समय में दुर्लभ सा लगता है। इनका कहना है कि शिष्यों कि सफलता पर मुझे जिस असीमित आनंद का अनुभव होता है। उसे मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता। उनका कहना है कि जब तक मेरे अंदर समर्थ रहेगी तब तक मैं राष्ट्र की कमजोर कड़ी को मजबूत और आत्मनिर्भर बनके के लिए प्रयास रत्न रहूंगा। गुरुकुल परंपरा से शिक्षा के क्षेत्र में बेमिसाल कार्य करने वाले गुरु जी सादा जीवन एवं उच्च विचारों की एक अनूठी मिसाल है। चुपचाप बिना किसी दिखावा के अपने मिशन के आगे बढ़ाते हुए छात्रों में अच्छे संस्कार, राष्ट्र, प्रेम, नैतिकता और मानवता की भावना जागृत कर रहे हैं। गुरु जी और शिष्यों के बीच अगाध प्रेम और अटूट श्रद्धा का परिणाम है कि उनके शिष्यों का पद सहित नाम गुरुकुल आश्रम में शिलापट्ट पर अंकित किया गया है। इनके शिष्यों की सोच है कि गुरु जी के महान कार्य की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने से लोग राष्ट्र सेवा के लिए प्रेरित होंगे।

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