महंगे इलाज से दम तोड़ रही सांसे

 जौनपुर। जिले में चिकित्सा-व्यवस्था की हालत काफी खराब है। यहां सरकारी अस्पताल बद से बदतर हालत में हैं, ऐसे में निजी अस्पतालों की चांदी कट रही है। यहां पिछले कुछ सालों में निजी अस्पतालों की श्रृंखला नजर आने लगी है, ऐसे में गरीबों के लिए सामान्य बीमारियों का इलाज करवा पाना भी आसान नहीं है। प्राइवेट अस्पतालों में इलाज इतना महंगा है कि लोग उसका खर्च उठाने में भी सक्षम नही हैं। अगर लोगों को गंभीर बीमारी है, तो वें अपना घर बेचे या पैसे के अभाव में मरने को तैयार रहे? यहां किसी भी निजी अस्पताल में साधारण बीमारी के इलाज पर हजारों का खर्च हो जाता है। जनता द्वारा खुद के लिए चुनी गई सरकारें और नेता भी प्राइवेट अस्पतालों में हो रही लूटखसोट और सरकारी अस्पतालों की हालत सुधारने के लिए आगे नहीं आ रहे हैं। स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करने के लिए जिले में पहुंचने वाले करोड़ों के बजट को अधिकारी खर्च ही नही कर पाते। ऐसे में सरकारी हेल्थ मशीनरी में अव्यवस्थाओं का होना लाजिमी है, लेकिन खास बात यह है कि लोकतंत्र की पहली कड़ी कहा जाने वाला वोट जब खुद के लिए सरकार चुनता है, तो सत्ता में आने के बाद वह सरकार उसके नुमाइंदे अधिकारी और नेता वोटर की परेशानियों को ही भूल जाते हैं। आज आम जनता के सामने महंगा इलाज सबसे बड़ी समस्या बनकर खड़ा हो गया है। सरकारी हेल्थ सेक्टर में पर्याप्त सेवाएं और सुविधाएं उपलब्ध नही होने के चलते मरीजों को मजबूर प्राइवेट अस्पतालों में जाना पड़ता है, जहां पर मरीज को भर्ती करने के बाद मोटी रकम खर्च होना तय है। ऐसे में जहां प्राइवेट के महंगे इलाज को देखकर ही लोगों की सांसे टूट जाती है, वहीं असाध्य बीमारियों का इलाज कराने वाले लोगों को अपने घर तक गिरवी रखने पड़ जाते हैं। लोकतंत्र को स्वस्थ रखने के सरकार के दावें इसी के चलते खोखले नजर आने लगे हैं। यहीं कारण है कि जिले में प्राइवेट अस्पतालों और निजी क्लीनिकों की बाढ़ सी आ गई है। सरकार जनता को सस्ती दवाइयां उपलब्ध कराने के लिए जेनरिक स्टोर खोलने का प्लान तो तैयार करती है, लेकिन सरकार के ऐसे प्लान दवा माफियाओं के मुंह का निवाला बनते नजर आते हैं। यदि स्वास्थ्य समस्या में सुधार लाना है, तो सरकार, उसके अधिकारियों और नेताओं को सरकारी अस्पतालों की हालत सुधारने के लिए मशक्कत करने की जरूरत है। जिले में सरकारी अस्पतालों का हाल बुरा है, इसके चलते प्राइवेट अस्पताल संचालकों की चांदी कट रही है। कुछ डॉक्टर सिर्फ मरीज की ओपीडी का पर्चा बनाने के नाम पर मोटी रकम वसूल रहे हैं। दिन भर जमकर ओपीडी करने के बाद प्राइवेट अस्पताल संचालक रात को चैन की नींद सोते हैं, क्योंकि उन्हें दिन भर में भारी आमदनी हो जाती है। इसके चलते रात के समय हालत बिगड़ने पर मरीजों को सही उपचार भी नही मिल रहा है।

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