श्रद्धा के साथ मनाया गया गुरु पूर्णिमा

जौनपुर। जिलें में गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व श्रद्धा, उल्लास से मनाया गया। खास दिन पर विभिन्न सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक संस्थाओं की ओर से गुरु पूजन कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। पर्व को लेकर मठ-मंदिरों में भोर से भक्ति उल्लास है। आश्रमों में गुरु का आशीष प्राप्त करने के लिए दूर से लोग आये। नगर के उर्दू बाजार स्थित बारी नाथ मठ सहित सहित अन्य इसी प्रकार के आस्था के केन्द्रों पर श्रद्धालुओं ने अपने वर्तमान व स्वर्गीय गुरूओ को नमन कर उनका आर्षीवाद लिया।  पूर्णिमा पर श्रद्धालु आदि गंगा गोमती के विभिन्न घाटों पर स्नान कर पूजन किया। 

ज्ञात हो कि आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-सन्त एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है। हिंदू सनातन शास्त्र के अनुसार, इस तिथि पर परमेश्वर शिव ने दक्षिणामूर्ति का रूप धारण किया और ब्रह्मा के चार मानसपुत्रों को वेदों का अंतिम ज्ञान प्रदान किया। 

इसके अलावा,यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। उनका एक नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। भक्तिकाल के संत घीसादास का भी जन्म इसी दिन हुआ था वे कबीरदास के शिष्य थे। शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है।

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