पल तमाचे मेरे गाल पर जड़ गए,जीने मरने की दुविधा में हम पड़ गए

 

जौनपुर। साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्था कोशिश की मासिक काव्य गोष्ठी शास्त्री नगर, जौनपुर में आयोजित की गई। गोष्ठी की अध्यक्षता प्रो पी सी विश्वकर्मा ने किया और मुख्य अतिथि प्रसिद्ध व्यंगकार सभाजीत द्विवेदी प्रखर जी रहे। मां सरस्वती की वंदना के पश्चात ख्यात शायर अहमद निसार ने जब पढ़ा सादगी ओढ़े हुए, संजीदगी पहने हुए एक एक लम्हा मिला मुझको सदी पहने हुए तो श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए।

 इसके बाद आए गिरीश कुमार  ने अपने मुक्तक पल तमाचे मेरे गाल पर जड़ गए,जीने मरने की दुविधा में हम पड़ गए,भूल से ही सही एक खता हो गई , सर झुकाना पड़ा, शर्म से गड़ गए लसे समाज की विसंगतियों पर प्रकाश डाला। 

जर्नादन अष्ठाना का गीत जिसके कांटों में इतना रस, उसके मधुवन में क्या होगा, श्रृंगार का मोहक चित्रण कर गया। प्रखर जी ने अपनी रचना / इतने राम कहां से लाऊं/सुनाकर समाज के पाखंड पर प्रहार किया।

प्रो आर एन सिंह का दोहा कभी किसी जयचंद से, नहीं मिलाना हाथ/बिघटनकारी तत्त्वों से सावधान रहें, कह गया। 

 प्रेम जौनपुरी की रचना/यह सोचकर परिंदा, चमन में ठहर गया/सामाजिक ताने बाने की ओर संकेत कर गई। अशोक मिश्र की कविता/शकुंतला/खूब पसंद की गई। गोष्ठी में डॉक्टर संजय सागर, रामजीत मिश्र, अंसार जौनपुरी, राजेश पांडेय, फूल चंद भारती, सुमति श्रीवास्तव, सुशील दुबे,प्रेम चंद तिवारी, ओ पी खरे,  रमेश चंद्र सेठ, समीर, रूपेश साथी, मोनिस जौनपुरी, कारी ज़िया ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया। संचालन अमृत प्रकाश ने किया और आभार डॉक्टर संजय सिंह सागर ने किया।

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