जहां खत्म होती हैं विज्ञान की सीमाएं, वहीं से वेद की शुरुआत

सुरेश गांधी/जितेन्द्र सिंह चौधरी

वाराणसी। आने वाला समय भारत और सनातन धर्म का है। भारत समाज और भूगोल का नाम है। दुनिया को धर्म का मार्ग दिखाना है। क्योंकि जहां विज्ञान की सीमाएं खत्म होती है, वेदों का ज्ञान वहां से शुरू होता है। अब पूरा विश्व वेद और अध्यात्म के बारे में सोचने लगा है। यह भारत का उत्थान काल है और उसे पूरी दुनिया को धर्म का ज्ञान देना है। देश भौतिक, आर्थिक, सामरिक और धार्मिक उन्नति के मार्ग पर है और विश्व गुरु बनेगा। यह बातें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत ने कही। वे वाराणसी में शिवाला स्थित राजा चेतोसह किला में कांची कामकोटि पीठाधीश्वर शंकराचार्य शंकर विजयेंद्र सरस्वती के चातुर्मास व्रत महोत्सव स्थल पर आयोजित अग्निहोत्र सभा को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि वेदों में सब समाहित है। वर्तमान समय में डिजिटल इंडिया की तरह डिवाइन इंडिया की भी जरूरत है। हमारे पास जानकारी तो है, लेकिन हम ही उसे पूरी तरह नहीं जानते। घोर कलयुग में भी हमारे अध्यात्म के संरक्षण के लिए कुछ लोग कार्य कर रहे हैं। धर्माचार्यों से कहा कि विश्व के सुख का मार्ग पूर्ण ध्यान से ही होकर जाता है। आप सभी शास्त्रों की रक्षा करने वाले हैं। आप धर्म-वेद का चिंतन करते रहें। आपकी सुरक्षा में पूरा हिंदू समाज को खड़ा करने का काम हमारा है। वेद और शास्त्रों का संरक्षण भारत व सनातन धर्म के उत्थान का काम है। भारत को संपूर्ण विश्व को धर्म देना है। सत्य का प्रतिपादन ही चारों वेदों के मूल में है। उन वेदों का आप जतन कर रहे हैं। सिर्फ जतन नहीं, उसे आप अग्निहोत्र धारण कर जी रहे हैं। मैं आपके दर्शन कर रहा हूं, यह मेरा सौभाग्य है।
इस मौके पर शंकराचार्य शंकर विजयेंद्र सरस्वती ने वाराणसी में हुए टेंपल कनेक्ट महासम्मेलन की सराहना करते हुए कहा कि मोहन भागवत के उस वक्त के व्यक्तब्य धर्म ध्वजा को आगे बढ़ायेंगे। क्योंकि अगर वो धर्म ही नहीं रहेगा और उसकी श्रद्धा ही नहीं रहेगी तो कैसे काम चलेगा। समाज में धर्म चक्र परिवर्तन के आधार पर सृष्टि चलती है। शरीर, मन और बुद्धि को पवित्र करके ही आराधना होती है। शंकर विजयेंद्र सरस्वती ने कांची शंकराचार्य काशी में चातुर्मास पर हैं। देश में बचे 140 अग्निहोत्री में से सौ से अधिक काशी आए हैं। इस अग्निहोत्र सभा में भाग लेने के आए भागवत ने विश्व शांति, मानव कल्याण व राष्ट्र समृद्धि के लिए चतुर्वेद की ऋचाओं से की जा रही उपासना में भाग लिया। अंत में शंकराचार्य शंकर विजयेंद्र सरस्वती व मोहन भागवत द्वारा 150 से अधिक अग्निहोत्र को अंगवस्त्रम व स्मृति चिन्ह देंकर सम्मानित किया गया। इसके पूर्व मोहन भागवत ने शंकराचार्य के साथ धार्मिक बातचीत के साथ परिसर में होने वाले सांस्कृतिक और धार्मिक अनुष्ठान अग्निहोत्र में भागीदारी की। इस दौरान कमोहन भागवत का सहज व्यवहार लोगों को आकर्षित करता रहा। पूरे परिसर में वैदिक मित्रों की गूंज रही। बारिश के बीच किला परिसर में पहुंचे सरसंचालक का स्वागत शंकराचार्य एवं प्रबंधन ने किया और गंगा दर्शन भी किया। इस दौरान सुरक्षा के तगड़े इंतजाम किए गए थे। संघ प्रमुख इससे पहले 18 जुलाई को वाराणसी में पांच दिवसीय प्रवास के दौरान आए थे।

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