सपा-रालोद के बीच सीटों के लिये लेफ्ट-राइट, कांग्रेस पिक्चर से आउट

स्वदेश कुमार

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी-राष्ट्रीय लोकदल और कांग्रेस ने अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों के लिए गठबंधन तो कर दिया है लेकिन लगता है कि इन दलों के नेताओं का दल के साथ दिल नहीं मिल पाया है। गठबंधन की अभी बुनियाद ही पड़ी थी और इसके कमजोर होने का अहसास भी होने लगा है। ऐसा इसलिए लग रहा है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को अनदेखा करते हुए समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल ने सीटों के बंटवारे की कवायद शुरू कर दी है। सूत्र बताते हैं कि राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष जयंत चौधरी ने समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की करीब एक दर्जन उन लोकसभा सीटों की सूची थमा दी है जिस पर वह अपने प्रत्याशी उतारना चाहते हैं। जयंत चौधरी ने जिन सीटों का चयन किया है कि वह मुस्लिम और जाट बाहुल्य हैं। इसको लेकर समाजवादी पार्टी में भी मंथन शुरू हो गया है लेकिन पूरी ‘पिक्चर’ से कांग्रेस गायब है जबकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कई सीटों पर कांग्रेस की भी नजर लगी हुई है। अभी कांग्रेस की तरफ से इसको लेकर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है लेकिन उत्तर प्रदेश कांग्रेस का आलाकमान इस पर नजर रखे हुये।
ऐसा लगता है कि लोकसभा चुनाव से पहले गठबंधन दलों के बीच दबाव की राजनीति का दौर शुरू हो गया है। सूत्रों के मुताबिक राष्ट्रीय लोकदल ने सपा के साथ गठबंधन में बने रहने के लिए दर्जन भर सीट मांगी है लेकिन समाजवादी पार्टी लोकसभा की सिर्फ दो सीट ही देने के मूड में है। बताया जा रहा है कि यदि अखिलेश पार्टी का ऑफर नहीं मानते हैं तो जयंत चौधरी कोई भी फैसला ले सकते हैं। माना जा रहा है कि आरएलडी की बीजेपी से भी बात चल रही है। बताया जा रहा है कि आरएलडी बिजनौर, सहारनपुर, मथुरा, हाथरस, बुलंदशहर, मेरठ, बागपत, नगीना, मुजफ्फरनगर और कैराना सीट से अपना उम्मीदवार उतारने की मांग की है। हालांकि बताया यह भी जा रहा है कि आरएलडी ने बीजेपी से संपर्क करने की कोशिश की थी लेकिन अभी कुछ फाइनल नहीं हुआ है। वैसे चर्चा यह भी है कि बीजेपी आलाकमान जयंत चौधरी को इंडिया गठबंधन से एनडीए के पाले में लाने की कवायद में लगा है लेकिन उन्हें अपनी पार्टी के बीजेपी में विलय का प्रस्ताव दिया गया है। दूसरा ऑफर उन्हें एक सीट देने का दिया गया.ऐसे में आरएलडी ने बीजेपी के साथ जाने से इंकार कर दिया है। वैसे भी अगर आंकड़ों के नजरिए से देखें तो पश्चिम में बीजेपी के लिए रालोद से ज्यादा बसपा फायदेमंद है। बसपा के साथ आने से बीजेपी हारी हुई सीटों पर भी जीत हासिल कर सकती है। बसपा सुप्रीमो मायावती की चुप्पी भी बता रही है कि उनका झुकाव बीजेपी की तरफ बढ़ता जा रहा है। 7 अगस्त 2023 को राज्यसभा में जब दिल्ली पर बिल आया तब और उसके बाद लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान भी बसपा मोदी सरकार के साथ खड़ी नजर आयी।
गौरतलब हो कि करीब 3 माह पूर्व राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) अध्यक्ष जयंत चौधरी ने सपा से गठबंधन टूटने की अफवाहों पर विराम लगा दिया था। उन्होंने कहा था कि 2024 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से गठबंधन को लेकर कहा कि इस पर फैसला विपक्षी दल मिलकर लेंगे। आरएलडी को लेकर यह भी कयास लगाए जा रहे थे कि वह कर्नाटक में इंडिया की बैठक में शामिल होगी लेकिन वहां जयंत चौधरी की गैरमौजूदगी को दबाव की राजनीति के तौर पर देखा जा रहा है। वैसे राज्यसभा में भी जब मानसून सत्र के दौरान दिल्ली के अधिकारियों के संबंध में बिल आया। जयंत चौधरी सदन से गैरहाजिर थे। इस पर उनकी पार्टी द्वारा सफाई दी जा रही है कि मेडिकल इमरजेंसी के चलते वह वोटिंग के समय मौजूद नहीं रह पाये थे।
बहरहाल राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष जयंत चौधरी जिस तरह से सीटों के बंटवारे के लिए तेजी दिखा रहे हैं, उसको लेकर राजनैतिक पंडितों का कहना है कि जयंत चौधरी नहीं चाहते हैं कि इंडिया गठबंधन में तब सीटों का बंटवारा हो। जब उनके लिए भाजपा में जाने के सभी रास्ते बंद हो जा, क्योंकि उस समय जयंत चौधरी को समाजवादी पार्टी के सामने सौदा करने का मौका नहीं मिल पाएगा। अभी यदि अखिलेश यादव सीटों के बंटवारे में रालोद को थोड़ा भी ना—नुकुर दिखाएंगे तो रालोद पाला बदलने में देर नहीं करेगा। वैसे भी रालोद के आईडियोलॉजी सबके साथ फिट हो जाती है।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं पूर्व सूचना आयुक्त उ0प्र0 हैं)

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