धूम्रपान करने से लोगों में होता है ‘‘सीओपीडी’’ जैसी जानलेवा बीमारी का जन्म

जौनपुर। जन्म से लेकर 16 वर्ष की आयु तक फेफड़े को परिपक्व होने में लगता है। गर्भस्थ शिशु का फेफड़ा मां के गर्भ में 20 से 28 सप्ताह के बाद प्रक्रिया शुरू करता है। इस समय मां को विशेष सावधानी की आवश्यकता होती है। धूम्रपान करने वाली महिलाओं को इस अवधि में जहां धूम्रपान नहीं करना चाहिये, वहीं चूल्हे से निकलने वाला धुंआ भी गर्भवस्थ शिशु के विकास में बाधित होता है। मां को बच्चे के उज्ज्वल भविष्य के लिये प्रदूषण, धूम्रपान और धुंआ वाले क्षेत्र से अपने को दूर रखना चाहिये। उक्त बातें डा. अतुल श्रीवास्तव छाती एवं फेफड़ा रोग विशेषज्ञ (चेस्ट स्पेशलिस्ट) जिला एवं क्षय रोग चिकित्सालय ने रविवार को नगर के एक होटल में पत्र-प्रतिनिधियों से वार्ता करते हुये कही। उन्होंने कहा कि मनुष्य का फेफड़ा पूरी शारीरिक संरचना में एक बेहद महत्वपूर्ण अंग की भूमिका निभाता है जिसके द्वारा वातावरण की आक्सीजन नसिका के माध्यम से टेªकिया (विण्ड पाइप) के द्वारा दोनों फेफड़ों की ब्रांकस एवं बान्कियोल के जरिये फेफड़े की सूक्ष्मतम इकाई अल्वियोलाई तक पहुंचती है जहां पर आक्सीजन खून की सूक्ष्म नलिकाओं के द्वारा अवशोषित होकर पूरे शरीर में हृदय के माध्यम से भेजी जाती है परन्तु फेफड़ा को रोगग्रस्त करने में विभिन्न प्रकार की बीमारियां जैसे- सीओपीडी (लंग फाइब्रोसी), एबीपीए, एलर्जी, ट्यूबकर-कुलोसिस आदि की अहम भूमिका होती है। डा. श्रीवास्तव ने कहा कि जाड़े के दिन में सीओपीडी के मरीज अक्सर एक्यूट अवस्था में गम्भीर तरीके से दम फूलने की शिकायत लेकर आते हैं जिन्हें अगर तुरन्त निदान न दिया जाय तो मरीज की मौत भी हो सकती है। सीओपीडी बीमारी का प्रमुख कारण धूम्रपान करना है लेकिन आजकल आटोमोबाइल्स, फैक्ट्री के धुएं द्वारा भी इस तरह की बीमारी देखी जा रही है। ग्रामीण स्तर पर बहुत सी महिलाएं जो बायो फ्यूल (लकड़ी एवं कंडी) पर भोजन बनाती है, उनको भी सीओपीडी की संभावना प्रबल रहती है। उन्होंने कहा कि सीओपीडी की बीमारी से फेफड़ा फूलकर बड़ा आकार ले लेता है और सही तरीके से बेंटीलेशन/परफ्यूशन नहीं हो पाता है जिसके कारण मरीज की सांस फूलने लगती है। धूम्रपान फेफड़े के कैंसर का भी प्रमुख कारण है। जैसे दिसम्बर से लेकर जनवरी तक के महीने में सीओपीडी एवं अस्थमा के मरीजों को सांस सम्बन्धी समस्या से गुजरना पड़ता है। कोहरा, कुहासा जिसमें एलर्जी के कण भी उपलब्ध रहते हैं, ये अस्थमा के मरीजों में सांस लेने की समस्या पैदा करते हैं। अन्त में उन्होंने कहा कि धूम्रपान से बचने के साथ लोगों को बहुत देर तक अपनी मोटर गाड़ी को भीड़ में चालू न रखें एवं फेस मास्क अवश्य प्रयोग करें। यह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है कि 16 वर्ष तक के बच्चे किसी भी हालत में धूम्रपान न करें। यदि फेफड़ा इतने कम समय में प्रभावित हो गया तो हमारे देश में उन्नत किस्म के कर्णधारों की कमी हो जायेगी। इस अवसर पर जिला महिला चिकित्सालय के बाल रोग विशेषज्ञ डा. संदीप सिंह, अरूण सिंह सहित अन्य चिकित्सक और सम्बन्धित लोग उपस्थित रहे।

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