पूर्व वीसी डॉ राजाराम यादव ने जाते जाते भी अपनों को चुन चुन कर बांटी रेवड़ियां


जौनपुर। पूरे तीन साल तक अपने कार्य व्यवहार,वक्तव्यों और निर्णयों से सदा विवादों में रहे पूर्व कुलपति डॉ राजाराम यादव ने जाते जाते भी अपने लोंगो को खुश करके गए। उनके खासमखास उनके गुण गाते नही थक रहे। लेकिन जानकारों का मानना है उनके दौर में विश्वविद्यालय ने अपना बहुत कुछ खो दिया है।लोंगो का कहना है कि अनर्गल कार्यों की बादशाहत हासिल थी डॉ राजाराम यादव को।ऐसा कुलपति विश्विद्यालय के इतिहास में कभी नही आया जो कि अपने निर्णयों तथा अपने निर्णयों और अपने बयानों को लेकर सदा चर्चा में रहा। चाहे अपने निर्माण कार्यों को लेकर, चाहे विश्विद्यालय द्वारा अंधाधुंध खर्चों को लेकर, चाहे गाजीपुर में दिए गए हत्या वाले और खंजड़ी वाले विवादित बयानों को लेकर, डॉ राजाराम यादव ने सदा सुर्खियां बटोरी। जनपद के तमाम बुद्धिजीवी,राजनीतिकदल,समाजसेवी और कलमकार उनके अनर्गल क्रिया कलापों का विरोध करते रहे लेकिन वह कुछ चुनिंदा लोंगों के साथ अपनी मनमानियों को अंजाम देते रहे।कार्यकाल के बाद अतिरिक्त रूप से पाए अपने अंतिम तीन महीनों में उन्होंने अपने खासमखास लोंगो पर खूब मेहरबानियां बरसाई। जून के पहले हप्ते में उनकी मनमानी कार्यप्रणाली से घबरा कर रजिस्ट्रार ने लम्बा अवकाश ले लिया था परन्तु उन्होंने उस पर भी हार नही मानी और विश्विद्यालय के सबसे विवादित शिक्षक को रजिस्ट्रार बनाकर अपनी मंशानुसार आदेश करवाते रहे। कुछ ऐसे भी आदेश हुए है जो कि पत्रांक रजिस्टर भी विवरण में दर्ज नही हैं लेकिन पत्रांक नम्बर आवंटित किया जा चुका है। परिसर के कर्मचारियों और संविदा शिक्षकों ने इसको लेकर पिछले दिनों खूब हंगामा भी किया था। संविदा शिक्षकों का यहां तक कहना था कि गुपचुप तरीके से अपने खास संविदा शिक्षकों को नियमित करने का आदेश भी दे गए हैं जबकि शासन ने ऐसा करने से मना किया था। शासन के तमाम निर्देशों और आदेशों को नकारते हुए उनके मन मे जो आया वह उन्होंने किया। कर्मचारी संघ लगातार अपना विरोध जताता रहा लेकिन वे अपने आवास पर बैठ कर मनमाना निर्णय करते रहे। यदि पिछले तीन महीनों के उनके आदेशो की समीक्षा शासन या वर्तमान कुलपति द्वारा किया जाय तो केवल और केवल नियमों के विपरीत ही सारे आदेश मिलेंगे। इस दरम्यान जिन लोंगो ने भी उन्हें राजधर्म और सही राह की सीख देनी चाही उन सभी का उन्होंने ट्रांसफर कर दिया हां ये अलग बात है कि उसमें बहुत सारे ट्रांसफर आदेश किसी तरह अधिकारियों ने रोक दिए। राजभवन से उनको हटाये जाने के बाद उनके आवास पर काम कराने वालों का मेला लगा रहा जो कि जाते जाते बना रहा। जाते जाते भी वह अपने लोंगो का ही काम कर उनको रेवड़ियां बांटते गए।

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