बेंगलुरू हत्याकाण्ड में मीडिया की दोहरी भूमिकाः शोर से लेकर खामोशी तक


आनन्द देव

बेंगलुरु में 29 वर्षीय महालक्ष्मी की नृशंस हत्या की खबर जब सामने आयी तो यह पूरे देश के लिए एक चौंकाने वाली घटना थी। महालक्ष्मी का शव, 59 टुकड़ों में बंटा हुआ, उसके अपार्टमेंट में मिला और उस भयानक दृश्य ने सभी को सन्न कर दिया। लेकिन यह मामला तब और सनसनीखेज हो गया जब महालक्ष्मी के अलग रह रहे पति हेमंत दास ने बयान दिया कि उसकी पत्नी का अशरफ नाम के एक व्यक्ति के साथ संबंध था। बस यही मीडिया को चाहिए था। अशरफ का नाम सामने आते ही टीवी चैनलों और ऑनलाइन पोर्टलों ने मामले को सनसनी बना दिया। रिपोर्ट्स में इस हत्याकांड की तुलना सीधे श्रद्धा वालकर हत्याकांड से की जाने लगी और एक धार्मिक रंग देने की कोशिश की गई। टीवी डिबेट्स और न्यूज रिपोर्ट्स में अशरफ को तुरंत हत्यारा घोषित कर दिया गया जबकि पुलिस उस समय भी जांच कर रही थी। 3 दिनों तक मीडिया ने इस मुद्दे को हवा दी। जैसे अशरफ के नाम से ही उन्हें अपनी टीआरपी का खजाना मिल गया हो।
हालांकि जब बेंगलुरु पुलिस की जांच पूरी हुई तो एक अलग सच्चाई सामने आई। असली हत्यारा कोई अशरफ नहीं, बल्कि मुक्ति रंजन राय नाम का व्यक्ति था जिसने महालक्ष्मी की हत्या कर उसे टुकड़ों में काट दिया था। बाद में उसने खुद भी खुदकुशी कर ली। उसने अपने आत्महत्या के नोट में यह स्वीकार किया था। पुलिस की जांच और मुक्ति रंजन राय की खुदकुशी से यह साफ हो गया कि अशरफ का इस हत्याकांड से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था। उसे पुलिस ने क्लीन चिट भी दे दी लेकिन जैसे ही अशरफ निर्दोष साबित हुआ, मीडिया का शोर अचानक गायब हो गया। चैनलों पर 3 दिनों तक चला अभियान जैसे थम गया। मुक्ति रंजन राय की गिरफ्तारी और आत्महत्या पर मीडिया ने चुप्पी साध ली। जैसे अब इस मामले में कोई "मसाला" नहीं बचा हो। यह स्थिति सवाल खड़ा करती है कि आखिर क्यों मीडिया अशरफ के नाम पर इतनी उग्र हो गई थी और जैसे ही सच सामने आया, उसने खामोशी क्यों ओढ़ ली?
क्या यह नफरत फैलाने का खेल है जिसमें मीडिया को सबसे ज्यादा मजा आता है? जब किसी मुसलमान का नाम आता है तो मीडिया अचानक जाग उठती है और जब सच्चाई सामने आती है तो वह पीछे हट जाती है। इस पूरे मामले में मीडिया की भूमिका यह भी दर्शाती है कि वह अपने संवैधानिक मूल्यों और प्रेस के आदर्शों का पालन नहीं कर रही हैं। नफरत फैलाने में मीडिया की टीआरपी तो जरूर बढ़ सकती है लेकिन इसके साथ ही उसकी जिम्मेदारी, निष्पक्षता और सत्यता भी सवालों के घेरे में आ जाती है। इस घटना से हमें यह सोचने की जरूरत है कि मीडिया का यह दोहरा रवैया क्या दर्शाता है? क्या यह पत्रकारिता का पतन नहीं है? क्या मीडिया का दायित्व सिर्फ नफरत फैलाना रह गया है? या उसे सच्चाई की खोज में रहना चाहिए?

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