राहुल गाँधी: 'बोलते हैं हिन्दी और समझते हैं अंग्रेजी'

आलू को सोना बनाकर उगलने वाली मशीन के वक्तव्य पर लगे 'पप्पू' का ठप्पा राहुल गाँधी ने 'भारत जोड़ो यात्रा और भारत न्याय यात्रा' करके उतार फेंका, साथ ही उन्होंने देश के बड़े हिस्से को जमीनी हकीकत के तौर पर समझा, उनकी इमेज गम्भीर नेता के रूप में बनी, लेकिन हरियाणा की चुनावी रैली में उनके दिए गए जलेबी वाले भाषण ने उन्हें फ़िर पप्पू बना दिया l

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-कैलाश सिंह-

राजनीतिक संपादक

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नई दिल्ली/लखनऊ, (तहलका विशेष)l देश में कांग्रेस ही ऐसा सबसे पुराना राजनीतिक दल है जो 'गाँधी' परिवार के राजकुमार को 'राजनीतिक गुर' सिखाने के लिए पार्टी को ही दो दशक तक प्रयोगशाला बनाकर रख दिया l हालांकि उन्होंने इस बीच आलू से सोना वाले बयान से मिली पप्पू की इमेज को हटाकर दो यात्राओं 'भारत जोड़ो और भारत न्याय यात्रा' से जहाँ देश के बड़े हिस्से को भ्रमण कर देखा वहीं आम आदमी जैसे मोची, किसान, छोटे दुकानदार, झुग्गी- झोपड़ी में रहने वालों से मिलकर उनकी तकलीफ को समझा l इसका परिणाम उन्हें 2024 के लोकसभा चुनाव में 99 सीटों के रूप में मिला, इतना ही नहीं, उन्हें नेता प्रतिपक्ष का ओहदा भी हासिल हो गया, लेकिन हरियाणा में हो रहे विधान सभा चुनाव की रैली में 'जलेबी' पर  दिए गए उनके भाषण ने उन्हें पप्पू का तमगा फ़िर लौटा दिया l 

इसी से कहा जाता है कि राजनीति बड़ी निष्ठुर चीज है, इसमें धारणा (परसेप्शन) का अहम रोल होता है l इसी से इमेज बनती और बिगड़ती है l राहुल गाँधी वर्ष 2004 में सक्रिय रूप से भारतीय राजनीति में आए और 2024 में उन्होंने अपने दम पर खुद को उठाते हुए कांग्रेस पार्टी को भी राष्ट्रीय स्तर पर फ़िर नया मुकाम दिलाया l हालांकि उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के चुनावी स्लोगन को पलटकर झूठा ही सही, लेकिन 'संविधान बदलने और आरक्षण खत्म करने' के आरोप को सच बनाकर आमजन तक परोस दिया l इसका असर ये हुआ कि कई राज्यों में भाजपा की सीटें कम हो गईं l उत्तर प्रदेश में तो भाजपा कुल 80 में से आधी से भी कम सीटों पर सिमट गई l 

लोकसभा चुनाव में मिली सफलता से राहुल गाँधी के बढ़े उत्साह ने उनमें अति आत्म विश्वास का ऐसा सृजन किया कि  कांग्रेस के लोग ही उन्हें सलाह देने की बजाय उनकी ही नकल करने में जुट गए l कब, कहाँ, क्या और कैसे बोलना है यह शायद 'सैम पित्रोदा' समझा सकते हैं, क्योंकि वही राहुल गाँधी के नजदीकी सलाहकार माने जाते हैं l लेकिन पार्टी के लोग बताते हैं कि यदि राहुल गाँधी की तरह कोई दूसरा नेता उनके जैसी हरकत करता मिल जाए तो उसकी छुट्टी तय हैl अब तो राहुल गाँधी की पसन्द के मद्देनजर 'करोड़पति' नेता भी उनसे मिलने जब जाते हैं तो वाहन और कपड़ों से अपना हुलिया 'खाकपति' वाला बना लेते हैं ताकि उनकी नज़र में यह दीनहीन सबसे ऊपर रहे l

कांग्रेस हाई कमान ' सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, प्रियंका वाड्रा गाँधी' के आगे कोई भी पार्टी नेता नहीं बोल सकता है l पार्टी हाई कमान के निकटस्थ सूत्रों की मानें तो राहुल गाँधी किसी की सलाह न लेते हैं और न मानते हैंl उन्होंने जब हरियाणा की चुनावी सभा में बोलना शुरू किया तो उनके हाथ में उस मिठाई की दुकान का वह डिब्बा भी था जिसमें लाई गई 'जलेबी' वह खाये थे और अपनी बहन के लिए ले जाने की बात भी कही l डिब्बे को लहराते हुए उन्होंने कहा कि 'इस जलेबी को दूसरे जिलों, राज्यों में भेजना और विदेशों में भी निर्यात करना चाहिए l इससे गरीब दुकानदार और उसके यहाँ काम करने वाले  दर्जनों मजदूरों को लाभ मिलेगाl मोदी सरकार में बैंक लोन ऐसे गरीबों को नहीं मिलेगा क्योंकि सारा पैसा तो अदानी और अंबानी को दिया जा चुका है l जलेबी की फैक्ट्री लगाकर उसके निर्यात से सैकड़ों लोगों को रोजगार मिल सकता है l'

भारत जोड़ो और न्याय यात्रा में शायद वह नहीं जान पाए कि जलेबी ही ऐसी मिठाई है जो देश के हर शहर, बाजार में बनती, बिकती और खाई जाती है l इसकी मियाद 30 मिनट की होती है, यानी इसे गर्म ही खाया जाता है l दोबारा इसको गर्म किया तो स्वाद खत्म हो जाएगा l  देश की आजादी से पूर्व गांवों में लगने वाले मेलों में इसका महत्व सामने आया और अब तो सुबह के नाश्ते में इसके साथ दूध या दही की जुगलबन्दी लोगों को रास आती है l

दरअसल राहुल गाँधी सुरक्षा की दृष्टि से बन्द कमरों में पले- पढ़े और जब घूमने का वक्त आया तो विदेश भ्रमण पर चले गए l वहाँ अधिक रहने के चलते अंग्रेजी को गहराई से समझने लगे l जब भारत लौटे तो सीखी गई हिन्दी बोलना शुरू किए l शायद उन्हें लगता है कि अंग्रेजी जितनी गहराई हिन्दी की भी होगी, लेकिन उन्हें नहीं पता कि 'हिन्दी भाषा' की गहराई समुंदर सरीखी है, इसमें सभी भाषाएँ नदियों की तरह समाहित होती हैं l यही कारण है कि राहुल गाँधी बोलते हैं हिन्दी और समझते हैं अंग्रेजी l यदि ऐसा न होता तो वह जलेबी की फैक्ट्री लगाने की परिकल्पना को अपने भाषण में शुमार न करते l हमारे देश में जलेबी को भी मुहावरा में शामिल करके लोग बोलते हैं, जैसे कोई व्यक्ति दूसरे की उलझी बात से ऊबने पर बोल देता है कि ' क्या जलेबी की तरह घुमा रहे हो, जो बोलना है, साफ और सीधा बोलो' ये है जलेबी l

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