जौनपुर की विरासत बचाने के लिए जद्दोजहद कर रही हैं वैशाली
मिलावट के बाजार में शुद्धता की जंग: जौनपुर की बेटी वैशाली ने संभाली 140 साल पुरानी विरासत की कमान
जौनपुर। मूली, मक्का, इमरती और खासकर चमेली व केवड़ा तिल्ली के तेल की खुशबू से देशभर में पहचान बनाने वाला जौनपुर आज अपनी विरासत को बचाने की जद्दोजहद कर रहा है। इस पहचान को जिंदा रखने की जिम्मेदारी अब एक बेटी ने अपने कंधों पर उठा ली है।
सन 1885 में स्थापित अंतूराम महावीर प्रसाद फर्म, जौनपुर पिछले 140 वर्षों से तिल्ली का तेल, चमेली तेल और केवड़ा जल बनाने का कार्य करती आ रही है। सात पीढ़ियों से यह परिवार परंपरागत विधि से शुद्ध उत्पाद तैयार करता रहा है। लेकिन बदलते दौर, बढ़ती मिलावट और कारीगरों की कमी ने इस ऐतिहासिक कारोबार को लगभग खत्म होने की कगार पर पहुंचा दिया था।
वर्ष 2015 तक यह प्रतिष्ठान बंद होने की स्थिति में आ गया। 2017 आते-आते पुराने कारीगर भी खत्म हो गए और नई पीढ़ी ने इस पारंपरिक काम में रुचि नहीं दिखाई, जिससे मैनपावर की भारी कमी हो गई।
इसी बीच परिवार पर संकट और गहरा गया। फर्म के संचालक संजय साहू गंभीर बीमारी की चपेट में आ गए। उस समय उनकी 30 वर्षीय बेटी वैशाली साहू, जो 2015-16 में बीबीडी लखनऊ से एमबीए करने के बाद नौकरी की तैयारी कर रही थीं, सब कुछ छोड़कर जौनपुर लौट आईं।
उन्होंने पहले पिता का इलाज संभाला और फिर धीरे-धीरे व्यापार की कमान अपने हाथ में ले ली। वर्ष 2025 में पिता के निधन के बाद पूरी जिम्मेदारी वैशाली के कंधों पर आ गई।
वैशाली कहती हैं, "पिता जी के जाने के बाद मैंने ठान लिया कि अपने पूर्वजों के इस धंधे और जौनपुर की पहचान को खत्म नहीं होने दूंगी। मेरे लिए मुनाफा नहीं, शुद्धता ज्यादा मायने रखती है। अगर गुणवत्ता से समझौता करूं तो परिवार और जिले दोनों की छवि खराब होगी।"
आज जब बाजार मिलावटी तेलों से भरा पड़ा है, तब वैशाली शुद्ध तिल्ली, चमेली और केवड़ा उत्पाद बनाने पर अडिग हैं। हालांकि मिलावटी और सस्ते उत्पादों की वजह से उन्हें आर्थिक लाभ कम मिल रहा है, लेकिन विरासत को जिंदा रखने का उनका संकल्प अडिग है।
वैशाली साहू सिर्फ एक व्यवसाय नहीं संभाल रहीं, बल्कि जौनपुर की 140 साल पुरानी खुशबू और परंपरा को बचाने की लड़ाई लड़ रही हैं।
यह कहानी सिर्फ कारोबार की नहीं, बल्कि एक बेटी के हौसले, जिम्मेदारी और अपनी मिट्टी से जुड़ाव की मिसाल है।

