तीसरी आंख' को मोतियाबिन्द या सुरक्षा के खोखले दावे?
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'नगर में लगे सीसीटीवी कैमरों में अधिकांश खराब
एक—दूसरे पर थोपने का कार्य कर रहे जिम्मेदारजौनपुर। जिला मुख्यालय की सुरक्षा और यातायात व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिये जिन चौराहों पर लाखों की लागत से 'तीसरी आँख' (सीसीटीवी) लगायी गयी थी, वे आज खुद धूल फांक रही हैं। आलम यह है कि मुख्यालय के सबसे महत्वपूर्ण स्थल दीवानी कचहरी अम्बेडकर तिराहा, कलेक्ट्रेट तिराहा सहित कई प्रमुख स्थानों पर लगे कैमरे पूरी तरह से शो-पीस बनकर रह गये हैं।
जिम्मेदारी के खेल में 'इधर पुलिस—उधर पालिका'
जब इस खराबी के बारे में पड़ताल की गयी तो विभाग एक-दूसरे पर पल्ला झाड़ते नजर आये। यातायात विभाग का तर्क कैमरों का संचालन नगर पालिका परिषद के हाथ में है। जब तक विभाग को आईपीबी कोड नहीं मिलता, कंट्रोल रूम का परिणाम शून्य रहेगा। नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी पवन कुमार से सम्पर्क करने पर गोल-मोल जवाब मिला। उनका कहना है कि उन्हें यह तक नहीं पता कि कैमरे चालू हैं या बन्द? वहीं दूसरी ओर कंट्रोल रूम की 'खामोशी' जिम्मेदारी सम्भालने वाले अधिकारियों का फोन 'कवरेज क्षेत्र से बाहर' है।
'चिड़िया चुग गयी खेत' वाली स्थिति का डर
नगर में आये दिन होने वाली हादसों और आपराधिक घटनाओं के खुलासे में ये कैमरे रीढ़ की हड्डी होते हैं लेकिन वर्तमान स्थिति यह है कि यदि आज कोई बड़ी वारदात हो जाय तो पुलिस के हाथ केवल खाली स्क्रीन ही आयेगी। प्रशासन तब जागता है जब घटना घट जाती है जिसे देखकर यही कहावत चरितार्थ होती है कि "अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत।"
सवाल जनता के जो मांगते हैं जवाब
आखिर इन कैमरों के रख—रखाव की अंतिम जिम्मेदारी किसकी है? क्या प्रशासन किसी बड़ी अप्रिय घटना का इंतजार कर रहा है? जनता के टैक्स के पैसे से लगे इन कैमरों का 'कोड' कब तक फाइलों में दबा रहेगा? क्या यातायात विभाग की सक्रियता केवल चालान काटने तक सीमित होनी चाहिये? क्या सुरक्षा के बुनियादी ढांचे का ठप होना पूरे जिले की कानून व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाता है? क्या पुलिस और पालिका के आपसी आरोप प्रत्यारोप से जिले की सुरक्षा व्यवस्था चुस्त दुरुस्त रह सकती है?

