दरवाजे-दरवाजे टेंट लगाने वाला युवक बना दो आलीशान मैरेज हॉल का मालिक, संघर्ष की मिसाल हैं राकेश सिंह
कभी लोगों ने कहा— "ठाकुर होकर टेंट लगाते हो", आज वही लोग कर रहे सम्मान। बेटी ने नीट में सफलता पाकर सरकारी मेडिकल कॉलेज में बनाई जगह
जौनपुर। सफलता कभी विरासत में नहीं मिलती, उसे कठिन संघर्ष, अथक मेहनत और अटूट विश्वास से हासिल करना पड़ता है। जौनपुर के भूपतिपट्टी निवासी राकेश सिंह 'सुक्खू' की जिंदगी इसी सच्चाई का जीवंत उदाहरण है। कभी घर-घर जाकर टेंट-कनात लगाने वाला यह युवक आज तिलक प्लेस (टीडी कॉलेज परिसर) और तिलक महल मैरेज हॉल, नेवादा जैसे दो भव्य मैरेज हॉल का मालिक है। उनकी कहानी हर उस युवा के लिए प्रेरणा है, जो बेरोजगारी, तानों या असफलताओं से निराश होकर अपने सपनों को छोड़ देना चाहता है।बास्केटबॉल का खिलाड़ी बनने का सपना, लेकिन किस्मत ने बदल दी राह
राकेश सिंह बताते हैं कि युवावस्था में उनका सपना बास्केटबॉल का अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बनने का था। खेल के प्रति जुनून भी था और मेहनत की कोई कमी नहीं थी, लेकिन किस्मत ने उनके लिए कुछ और ही तय कर रखा था। परिस्थितियों ने उन्हें खेल के मैदान से निकालकर रोजगार की राह पर ला खड़ा किया।
उन्होंने टेंट-कनात का छोटा-सा व्यवसाय शुरू किया। उस दौर में उन्हें समाज के ताने भी सुनने पड़े। लोग कहते थे, "ठाकुर होकर यह छोटा काम करते हो?" लेकिन राकेश सिंह ने इन बातों को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत बना लिया।
जिंदगी ने खेली सांप-सीढ़ी की बाजी
राकेश सिंह की जिंदगी किसी सांप-सीढ़ी के खेल से कम नहीं रही। कभी कारोबार ने ऊंचाइयों तक पहुंचाया तो कभी अचानक आई विपत्तियों ने उन्हें जमीन पर ला खड़ा किया। हर बार हालात ने उनकी परीक्षा ली, लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय और मजबूती से वापसी की।
उन्होंने अपनी मेहनत की कमाई और दोस्तों के सहयोग से पीली कोठी स्थित टीडी कॉलेज परिसर की वर्षों से बंद और जर्जर इमारत को लीज पर लेकर लाखों रुपये खर्च कर आधुनिक मैरेज हॉल में बदल दिया। कारोबार ने रफ्तार पकड़नी शुरू ही की थी कि हाईकोर्ट के एक आदेश के बाद दोनों मैरेज हॉल पर ताला लग गया।
एक झटके में सब कुछ बिखर गया
कारोबार बंद हो गया। आमदनी का एकमात्र जरिया खत्म हो गया। दूसरी ओर बच्चों की पढ़ाई, परिवार की जिम्मेदारियां और कर्ज देने वालों का दबाव लगातार बढ़ता गया। यह ऐसा दौर था, जब कोई भी व्यक्ति टूट सकता था।
लेकिन राकेश सिंह ने परिस्थितियों के सामने घुटने नहीं टेके। उन्होंने खुद पर भरोसा रखा और ईश्वर में आस्था बनाए रखी। यही विश्वास उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।
फिर मिली नई राह, नेवादा में खड़ा कर दिया आलीशान मैरेज हॉल
संघर्ष के इसी दौर में उन्हें वाराणसी-लखनऊ हाईवे स्थित नेवादा में जमीन लीज पर मिली। उन्होंने फिर कर्ज लिया और पूरी मेहनत के साथ तिलक महल मैरेज हॉल का निर्माण कराया। कुछ ही समय में यह मैरेज हॉल लोगों की पहली पसंद बन गया।
इसके बाद किस्मत ने एक बार फिर उनका साथ दिया। हाईकोर्ट का फैसला उनके पक्ष में आया और तिलक प्लेस का संचालन भी दोबारा शुरू हो गया। आज दोनों प्रतिष्ठान सफलता के साथ संचालित हो रहे हैं।
बेटी की सफलता बनी सबसे बड़ी कमाई
राकेश सिंह कहते हैं कि कारोबार में उतार-चढ़ाव आते रहे, लेकिन उन्होंने कभी इसका असर अपने बच्चों की पढ़ाई पर नहीं पड़ने दिया। कठिन आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने शिक्षा से समझौता नहीं किया। उनकी मेहनत का सबसे बड़ा पुरस्कार तब मिला, जब उनकी बेटी ने इस वर्ष नीट परीक्षा में शानदार सफलता हासिल कर सरकारी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश पाया।
जो कभी ताने देते थे, आज वही कर रहे सम्मान
शिराज-ए-हिंद डॉट कॉम से बातचीत में राकेश सिंह ने कहा,
"जब मैंने टेंट का काम शुरू किया था, तब अपनी ही बिरादरी के लोग कहते थे कि ठाकुर होकर यह काम करते हो। आज वही लोग मेरी पीठ थपथपा रहे हैं। समय सबको जवाब दे देता है।"
उन्होंने कहा कि उनके संघर्ष के दौरान कुछ सच्चे दोस्त और शुभचिंतक हमेशा उनके साथ खड़े रहे। हालांकि कुछ ऐसे लोग भी थे, जो सामने से साथ देते थे और पीछे से नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते थे, लेकिन ईश्वर की कृपा से वे सफल नहीं हो सके।
युवाओं के नाम संदेश
राकेश सिंह का मानना है कि बेरोजगारी का सबसे बड़ा इलाज स्वरोजगार है। उनका कहना है—
"लज्जा छोड़िए, अपना काम शुरू कीजिए। कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता। छोटा केवल हमारा नजरिया होता है। यदि ईमानदारी, मेहनत और धैर्य के साथ व्यवसाय करेंगे तो सफलता एक दिन जरूर आपके कदम चूमेगी।"
संघर्ष का सबसे बड़ा संदेश
राकेश सिंह की कहानी बताती है कि जीवन में सफलता पाने के लिए बड़े संसाधनों से ज्यादा बड़ा हौसला चाहिए। ताने, असफलताएं, आर्थिक संकट और धोखे—ये सब रास्ता रोक सकते हैं, लेकिन मंजिल नहीं। जो व्यक्ति गिरकर भी उठना जानता है, वही इतिहास लिखता है।
आज राकेश सिंह सिर्फ दो मैरेज हॉल के मालिक नहीं हैं, बल्कि हजारों बेरोजगार युवाओं के लिए यह संदेश हैं कि "अगर इरादे मजबूत हों तो दरवाजे-दरवाजे टेंट लगाने वाला भी एक दिन अपनी मेहनत से सफलता का महल खड़ा कर सकता है।"


