जौनपुर सदर सीट पर सपा में टिकट की जंग तेज, मुस्लिम दावेदारों के बीच शकील अहमद का नाम चर्चा में
लगातार दो विधानसभा चुनावों में हार के बाद सपा के सामने जिताऊ चेहरे की तलाश की चुनौती, सामाजिक सरोकारों और हिंदू-मुस्लिम रिश्तों के सहारे मजबूत दावेदारी का दावा
जौनपुर। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की सियासी बिसात बिछने लगी है। चुनावी रण में उतरने के इच्छुक नेताओं ने अपनी-अपनी पार्टियों से टिकट हासिल करने के लिए ताकत झोंकनी शुरू कर दी है। भाजपा, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस, बसपा समेत विभिन्न दलों और उनके संभावित सहयोगियों में दावेदारी का दौर तेज होता जा रहा है। इसी बीच जौनपुर सदर विधानसभा सीट पर सपा के टिकट को लेकर सियासी सरगर्मी सबसे ज्यादा दिखाई दे रही है। यहां दावेदारों की लंबी फेहरिस्त के बीच पार्टी के सामने सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर किस चेहरे पर दांव लगाया जाए, जो चुनावी समीकरणों को अपने पक्ष में मोड़ सके।लगातार हार से बदलेगी सपा की रणनीति?
जौनपुर सदर सीट का चुनावी इतिहास समाजवादी पार्टी के लिए कई सवाल खड़े करता है। वर्ष 2012 में कांग्रेस के नदीम जावेद ने इस सीट पर जीत दर्ज की थी। वर्ष 2017 में सपा ने गठबंधन के तहत यह सीट कांग्रेस के खाते में छोड़ दी और कांग्रेस ने नदीम जावेद को दोबारा मैदान में उतारा। हालांकि, भाजपा के गिरीश चंद्र यादव ने उन्हें शिकस्त दे दी। इसके बाद वर्ष 2022 में सपा ने पूर्व विधायक मो. अरशद खान पर भरोसा जताया, लेकिन उन्हें भी गिरीश चंद्र यादव के हाथों हार का सामना करना पड़ा।
लगातार दो चुनावों में मिली हार के बाद 2027 में सपा के सामने अपनी रणनीति नए सिरे से तय करने की चुनौती है। राजनीतिक हलकों में इस बात को लेकर भी चर्चा है कि पार्टी इस बार प्रत्याशी चयन में जातीय और सामाजिक समीकरणों के साथ व्यापक जनस्वीकार्यता को प्राथमिकता दे सकती है। हालांकि, सपा की ओर से अभी तक प्रत्याशी चयन को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
सपा-कांग्रेस गठबंधन पर भी निगाहें
सदर सीट पर कांग्रेस की संभावित दावेदारी भी चुनावी चर्चा का अहम हिस्सा है। गठबंधन की स्थिति में कांग्रेस इस सीट को अपने खाते में चाह सकती है, लेकिन सपा और कांग्रेस के बीच 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए गठबंधन तथा सीटों के बंटवारे को लेकर अभी अंतिम तस्वीर स्पष्ट नहीं है। ऐसे में टिकट की दावेदारी के साथ-साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि सदर सीट पर चुनावी मुकाबले की रूपरेखा किस दल के फैसले से तय होगी।
मुस्लिम दावेदारों की लंबी कतार, शकील अहमद भी लगे हैं लाइन में
समाजवादी पार्टी से टिकट की उम्मीद लगाए मुस्लिम नेताओं में पूर्व विधायक मो. अरशद खान, मो. आरिफ हबीब, शकील अहमद, राष्ट्रीय प्रवक्ता अमीक जमेई, पूर्व सभासद साज़िद अलीम,अनवारुल हक, कमाल आजमी और डॉ. सरफराज खान समेत कई नाम चर्चा में हैं। सभी की अपनी राजनीतिक पहचान, कार्यक्षेत्र और समर्थकों का आधार है। लेकिन टिकट की दौड़ में केवल पार्टी के प्रति निष्ठा ही नहीं, बल्कि क्षेत्र में जनसंपर्क, सामाजिक स्वीकार्यता और विभिन्न वर्गों के मतदाताओं तक पहुंच भी अहम भूमिका निभा सकती है।
इन्हीं संभावित दावेदारों में दवा कारोबारी शकील अहमद का नाम भी चर्चा में है। लायंस क्लब, जौनपुर जेसीज क्लब और अन्य सामाजिक संगठनों से जुड़े रहने के कारण उनकी पहचान सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय व्यक्ति के रूप में रही है। उनके समर्थकों का मानना है कि विभिन्न वर्गों के लोगों से उनके व्यक्तिगत संबंध और सामाजिक संस्थाओं के जरिए बनी पहचान चुनाव में उनकी दावेदारी को मजबूती दे सकती है।
24 वर्षों की सियासी सक्रियता और संगठन में लंबा अनुभव
शकील अहमद की राजनीतिक यात्रा वर्ष 2002 से शुरू हुई। पार्टी में करीब 24 वर्षों की सक्रियता के दौरान उन्होंने संगठन के विभिन्न पदों पर काम किया। वर्ष 2002 में सक्रिय सदस्य बनने के बाद 2005 से 2012 तक नगर अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली। इस अवधि में सदर विधायक और नगर पालिका चुनावों में पार्टी के लिए काम करते हुए 12 सभासदों को जिताने में भूमिका निभाने का दावा किया जाता है।
वर्ष 2016 से 2022 तक उन्होंने जिला उपाध्यक्ष और सदर विधानसभा प्रभारी के रूप में संगठनात्मक जिम्मेदारियां निभाईं। उनके राजनीतिक परिचय के अनुसार, गठबंधन के दौर में लोकसभा और विधान परिषद की स्नातक एवं शिक्षक निर्वाचन संबंधी गतिविधियों में भी उन्होंने पार्टी के लिए काम किया। पार्टी की जनपदीय और प्रादेशिक बैठकों, आंदोलनों तथा विभिन्न कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी रही है। वह समाजवादी बुलेटिन के आजीवन सदस्य भी हैं।
सामाजिक संस्थाओं से जुड़ाव बना पहचान का आधार
शकील अहमद की दावेदारी का एक प्रमुख पक्ष उनका सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय रहना है। वह जौनपुर जेसीज क्लब के पूर्व अध्यक्ष, लायंस क्लब जौनपुर के पूर्व अध्यक्ष और जेसी बालवाड़ी स्कूल के पूर्व चेयरमैन रह चुके हैं। इसके अलावा वह सायमा खान मेमोरियल ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं।
उनके मुताबिक, इस ट्रस्ट के माध्यम से वर्ष 2017 से जरूरतमंद लड़कियों की शिक्षा, विवाह तथा मदरसे के बच्चों को पढ़ाई सहित अन्य कौशलों का प्रशिक्षण देने जैसे कार्य किए जा रहे हैं। वह शहीद उमानाथ सिंह जिला चिकित्सालय की रोगी कल्याण समिति के शासकीय सदस्य और जिला शांति समिति के सदस्य भी हैं।
सामाजिक संगठनों में लंबे समय तक सक्रिय रहने के चलते उनके विभिन्न समुदायों के लोगों से संपर्क होने की बात कही जाती है। उनके समर्थकों को उम्मीद है कि यह सामाजिक पूंजी चुनावी राजनीति में भी उपयोगी साबित हो सकती है। हालांकि, सामाजिक संबंधों का वास्तविक चुनावी प्रभाव मतदाताओं के रुख और स्थानीय मुद्दों पर निर्भर करेगा।
व्यापारिक और धार्मिक संगठनों में भी सक्रियता
शकील अहमद दवाओं के थोक वितरण और खुदरा कारोबार से जुड़े हैं। वह केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स वेलफेयर एसोसिएशन, जौनपुर के चेयरमैन तथा उत्तर प्रदेश उद्योग व्यापार प्रतिनिधिमंडल के प्रांतीय मंत्री भी हैं।
धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों के क्षेत्र में वह मरकजी सीरत कमेटी के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं। इन विभिन्न जिम्मेदारियों के जरिए उनका संपर्क व्यापारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और धार्मिक संगठनों से जुड़े लोगों के बीच बना रहा है।
असली कसौटी होगी सर्वसमाज में स्वीकार्यता
जौनपुर सदर सीट पर सपा के टिकट की लड़ाई केवल दावेदारों की संख्या तक सीमित नहीं रहने वाली है। पार्टी के सामने ऐसा प्रत्याशी चुनने की चुनौती होगी, जो अपने परंपरागत समर्थकों को एकजुट रखने के साथ अन्य वर्गों के मतदाताओं के बीच भी प्रभावी पहुंच बना सके। मुस्लिम समाज से किसी चेहरे को टिकट मिलता है या पार्टी किसी दूसरे सामाजिक समीकरण पर विचार करती है, यह फिलहाल भविष्य के गर्भ में है।
शकील अहमद के समर्थक उनके सौम्य व्यवहार, सामाजिक सक्रियता, संगठनात्मक अनुभव और विभिन्न समुदायों के लोगों से व्यक्तिगत संबंधों को उनकी ताकत बताते हैं। लेकिन विधानसभा चुनाव में टिकट की अंतिम कसौटी पार्टी नेतृत्व का आकलन, जमीनी संगठन की स्थिति, स्थानीय मुद्दों पर पकड़ और मतदाताओं की स्वीकार्यता ही होगी।

