महिलाओ ने खुलकर सुनाई अपनी दर्द भरी दस्ता
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गाजीपुर-महिलाओ पर आये दिन हमले,उत्पीडन के साथ ही घरेलु हिंसा की खबरे आती रहती है। जिसकी सुनवाई करने में पुलिस और जिला प्रशासन नाकाम रहता है जिसके चलते पीडित को कोर्ट का सहारा लेना पडता है जहां सुनवाई और फैसला होने में वर्षो बित जाते है। ऐसे में महिला आयोग की जिम्मेदारी बढ जाती है की वह महिलाओ के साथ न्याय करे। जिसके तहत शुक्रवार को जनपद में पहली बार राज्य महिला आयोग की जनसुनवाई कार्यक्रम पी0डब्लू0डी0 के गेस्ट हाऊस में हुआ जिसकी अध्यक्षता महिला आयोग की सदस्य शीला चतुर्वेदी ने किया। गाजीपुर ही नही पुरे देश मे अबलाओ पर उत्पीडन की घटनाये होती रहती है बहुत सारे मामले ऐसे है जिसे महिलाये लाज और शर्म के चलते किसी को बता नही पाती है तो कुछ न्याय के लिए गुहार लगाती है लेकिन उन्हे न्याय मिलने में सालो साल बित जाते है।ऐसे में राज्य महिला आयोग लखनऊ के द्वारा महिला उत्पीडन के खिलाफ उनके यहां पडे आवेदन पत्रो पर जन सुनवाई का कार्यक्रम घंटो चला। इस जनसुनवाई में जहां 38 मामले पुलिस विभाग की ओर से वर्षो से लम्बित थे तो वही राजस्व व जिला प्रशासन के 8 मामले आज से नही बल्कि पिछली सरकार के समय से पडे हुए थे जिस पर कोई अब तक कारवाई नही हो पाई थी। इन मामलो में जहां पीडीत को महिला आयोग के द्वारा उनकी समस्याओ को जानने के बारे में बुलाया गया था वही समबन्धित विभाग के अधिकारी भी इस सुनवाई के दौरान डटे रहे। लखनऊ से आई महिला सदस्य ने सभी पीडितो से बारी बारी उनकी समस्याओ को सुना जिसके चलते कई मामलो के निस्तारण तो तुरन्त हो गया वही कई मामलो के निस्तारण के लिए अगली तारीख भी पडी। वही राज्य महिला आयोग में पूर्व से ही अपना प्रार्थना पत्र डालने के बाद न्याय की आस खो चुकी दर्जनो महिलाए अपनी बारी का इन्तजार करती नजर आई और उन्हे अब महिला सदस्य के द्वारा न्याय मिलने की उम्मीद जगती दिख रही थी। महिलाओ ने अपनी समस्या को बेधडक बताया।
गाजीपुर पुलिस बेरोजगार युवको को दे रही है ट्रेनिगं
गाजीपुर-अभी तक आप सभी पुलिस के उस घिनौने कारनामो के बारे में जानते होंगे जो आम जनमानस के गले नही उतरती यानि की पुलिस का क्रुर चेहरा,अवैध वसुली,आमजनमानस का किसी भी मामले में सुनवाई ना होना आदि। लेकिन जनपद की पुलिस ने इससे थोडा हट कर एक ऐसी योजना चला रही है जिसके चलते आने वाले दिनो में जनपद के बेरोजगार युवको को पुलिस भर्ती,आर्मी भर्ती में राहत मिल सके। जी हां इन दिनो पुलिस ने जनपद के बेरोजगार वे युवक जो देश सेवा के लिए पुलिस या फिर फौज में शामिल होना चाहते है लेकिन उनके पास पैसो की कमी के वजह से चयन नही हो पाता है ऐसे ही युवको को जनपद की पुलिस एकलब्य योजना के तहत प्रशिक्षित करने का कार्य कर रही है।एकलब्य और द्रोणाचार्य की कहानिया आप किताबो में पढते व सुनते आये है की द्रोणाचार्य से छिप छिपकर किस प्रकार एकलब्य एक वीर योद्वा बन गया था। कुछ इसी तरह जनपद की पुलिस भी द्रोणाचार्य की भूमिका में इन दिनो नजर आ रही है। जनपद में पिछले दिनो सेना की भर्ती के दौरान बहुत सारे युवक ना जानकारी में भर्ती से वंचित हो गये और अगली तैयारी के लिए लबे सडको पर बिना किसी प्रशिक्षक के तैयारी कर रहे थे। जिससे आये दिन दुर्घटनाओ की आशंका बनी रहती थी। इसी को देखते हुए जनपद की पुलिस ने ऐसे युवको को अपनी देखरेख में योग्य विभागीय प्रशिक्षको के सानिध्य में प्रशिक्षण देने का फैसला वह भी पुर्ण रूप से निशुल्क कराने की ठानी है। वैसे तो इसके बारे में पुलिस अधीक्षक डा0उमे”ा चन्द श्रीवास्तव पिछले काफी दिनो से सोच रखे थे लेकिन उसे अमली जामा अब देते हुए नजर आ रहे है। जिसके लिए उन्होने अपने विभाग में एकलब्य योजना का आरम्भ किया जिसमें देश सेवा में जाने वाले युवको को प्रतिदिन पुलिस लाईन के मैदान में अपने योग्य प्रशिक्षको की निगरानी में प्रशिक्षण दिलाना आरम्भ किया। प्रतिदिन जनपद के विभिन्न थाना क्ष्ेात्रो के सैकडो युवक शामिल हो रहे है। इन युवको का प्रशिक्षण अल सुबह 7 बजे आरम्भ होता है जिसमें इन युवको की नापी,चेस्ट के साथ ही दौड की परख किया जाता है। साथ ही जिन युवको की लम्बाई मानक से कम होती है उन्हे कहां और किस जांब के लिए आवेदन करना चाहिए वो भी बताया जा रहा है। साथ ही साथ उन्हे अनुशासन का वो पाठ प्रतिदिन पढाया जा रहा है जो उन्हे भर्ती के दौरान और भर्ती के बाद अपने जीवन में अमल लाना होता है। इन प्रशिक्षण में पास होने वाले युवको को विभाग की तरफ से लिखित परीक्षा भी करा उन्हे पुर्ण रूप से भर्ती से पूर्व ही तैयार करने की योजना है ताकी आगे आने वाले भर्ती में किसी भी प्रकार की गडबडी ना हो साथ ही जनपद के ज्यादा से ज्यादा युवको का चयन हो। पुलिस विभाग की एकलब्य योजना में प्रतिदिन शामिल हो रहे युवकांे में इन दिनो खुशी का ठिकाना नही है कारण की जिस प्रशिक्षण के लिए उन्हे कोचिंग में जाकर हजारो रूपये खर्च करने पडते है वह आज उन्हे निशुल्क के साथ ही पुलिस के योग्य प्रशिक्षको के द्वारा प्रशिक्षण पाना उनके लिए सौभाग्य की बात है।
उत्तर प्रदेश का महिला एवं बाल विकास विभाग अनैतिकता के गर्त में
हमारे राजनैतिक नेतृत्व और नौकरशाहो में लोकहित के कार्याें के प्रति इच्छाशक्ति की कमी तथा नैतिकता के लोप का ही परिणाम है, प्रदेश में स्थापित महिला एवं बाल विकास विभाग में उत्पन्न अनेक विसंगतियां। मसलन प्रदेश के लगभग तीस जिलों में तैनात प्रभारी जिला कार्यक्रम अधिकारी जो मूलतः बाल विकास परियोजना अधिकारी हैं। इनके द्वारा करोड़ों रूपये का आहरण-वितरण का कार्य किया जा रहा है जबकि वह भी यह जानते हैं कि उन्हें आहरण-वितरण का अधिकार प्राप्त ही नहीं है।
बताते चले कि वित्त विभाग के शासनादेश के अनुसार अराजपत्रित अधिकारी जिनका वेतनमान 6500-10500 के नीचे हो तो इस वर्ग के अधिकारी को आहरण-वितरण का अधिकार नहीं दिया जा सकता। फिर प्रदेश के यह बाल विकास परियोजना अधिकारी तो 5000-8000 के ही वेतनमान वर्ग में हैं जो अराजपत्रित अधिकारी वर्ग की श्रेणी में हैंं। अतः अराजपत्रित अधिकारी को आहरण-वितरण का अधिकार किसी भी दशा में देय नहीं है।
यहां यह प्रश्न उठता है कि क्या इन पर कोई निगरानी तंत्र नहीं है? यदि है तो वह क्या कर रहा है? आज तक इन प्रभारी जिला कार्यक्रम अधिकारियों को अनाधिकार आहरण-वितरण करने से रोका क्यों नहीं गया? क्या निगरानी तंत्र किसी बड़ी विभागीय घटना की प्रतीक्षा कर रहा है जैसा कि आम तौर पर होता है।
दूसरी ओर भारतीय लोक प्रशासन से स्वच्छ, पारदर्शी, बेहतरीन प्राशासनिक एवं प्रबन्धकीय सेवाओं की अपेक्षा की जाती है, इनसे बेहतर निगरानी तथा समन्वय की भी आशा रहती है। खासकर उन मामलों में जिन सार्वजनिक नीतियों से नागरिक प्रभावित होते हैं फिर यह इस प्रकरण पर मूकदर्शक क्यों हैं? यही आई0ए0एस0 कलेक्टर, निदेशक, सचिव और मुख्य सचिव निगरानीकर्ता के रूप में तैनात हैं तो क्या यह निगरानीकर्ता प्रदेश के जिलों के प्रभारी जिला कार्यक्रम अधिकारियों के इस अनैतिक क्रिया-कलापों के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। यदि हां तो क्या इस प्रकार के चूकों के लिए इन्हें दण्डित किये जाने का प्राविधान नहीं होना चाहिए। क्या दुर्गा नागपाल को आधे घण्टे में ही निलम्बित करने वाली सरकार इतने बड़े अनैतिकता पर मूकदर्शक बनी रहेगी जिसका मूल कर्तव्य ही है कि वह साफ एवं सक्षम लोक प्रशासन प्रदान करेंं।
