अपने ही शहर में बेगाने हो गये है क्षेम जी !


  एक पल ही जियो फूल बनकर जियो , सूल बनकर जीना नही जिंदगी ………… इन कविताओ सहित हजारो रचनाओ के रचयिता छायावादी साहित्कार स्व 0 श्रीपाल सिंह क्षेम देश ही नही पूरे एशिया में परिचय के मोहताज नही रहे। इनके द्वारा लिखी गई किताबे देश के कई विश्व विद्यालयो में पढाई जाती है। यह महान लेखक और कवि आज सरकारो की उपेक्षा के चलते अपने शहर में ही बेगाने हो गये है। इनके कार्यक्रमो में स्थानीय नेताओ ने क्षेमजी के नाम पर प्रेक्षा गृह स्थापित कराने रोड वेज तिराहे पर उनकी मूर्ति स्थापित कराने जैसे तमाम वादे जरुर किये लेकिन वह भाषणो तक ही सिमट कर रह गया। आज उनके परिवार में जाकर पत्नी द्रौपदी और पुत्र शशि मोहन सिंह से बातचीत किया गया तो उनका जख्म एक फिर हरा हो गया। पुत्र शशि मोहन ने दर्द भरे आक्रोश से कहा कि बाबूजी निस्वार्थ भाव हमेशा पुरे देश में मात्र भाषा को फ़ैलाने का काम किया इसके लिए उन्होंने अमेरिका जाने से ठुकरा दिया। लेकिन हमारी सरकारे उन्हें कभी सम्मान नही दिया। राजनैतिक पार्टियो और नेताओ के चाटकारो को यश भारतीय सम्मान मिल गया लेकिन क्षेम जी को यह सम्मान नही मिला।
क्षेमजी की पत्नी द्रौपदी भी राजनीत की रोटियां सेकने वाले नेताओ पर अपनी भड़ास निकालते हुए कहा कि नाचने गाने वालो को सरकार सम्मान दे सकती है लेकिन मेरे पति जैसे कवियो की उपेक्षा ही की जाती है। जो सरकार के चाटुकार होते है उन्हें वह सब कुछ मिल जाता है जिसके वह हक़दार होना तो दूर की बात उसके आस पास भी नही होता है।

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