तन मन और व्यवहार को बदल देता है तनाव: पीसी मिश्र
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जौनपुर।
वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के व्यवहारिक मनोविज्ञान की ओर
से मंगलवार को संकाय भवन के संगोष्ठी हाल में तनाव एवं स्वास्थ्य विषयक
संगोष्ठी का आयोजन किया गया। बतौर मुख्य अतिथि लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रो.
पीसी मिश्रा ने तनाव और स्वास्थ्य के विविध पहलुओं को विस्तार से
डिमास्ट्रेशन के माध्यम से समझाया। उनका मानना है कि तनाव व्यक्ति के तन,
मन और व्यवहार में परिवर्तन ला देता है।
इस
अवसर पर उन्होंने कहा कि मानव को तनाव हमेशा सकारात्मक रूप में लेना
चाहिए। भारतीय परिदृश्य में तनाव का स्वरूप सत्यम, शिवम् और सुन्दरम् की
तरह है। उनका मानना है कि तनाव सत्य है, शिव है और सुंदर भी है। उन्होंने
कहा कि मानव तभी पूर्ण रूप से स्वस्थ्य रह सकता है जबकि उसकी सोच और भावना
सकारात्मक हो। ईष्र्या और द्वेष रखने वाले अधिकतर लोग नकारात्मक तनाव के
शिकार होते है। इसके बाद उन्हें उससे निकाल पाना बहुत मुश्किल होता है।
उन्होंने कहा कि आयुर्वेद में वात, पित्त और कफ को तनाव से ही जोड़कर देखा
गया है। जबकि मनोवैज्ञानिक इसे ईष्र्या, जलन और भय के रूप में देखते है।
उन्होंने कहा कि इसे सामाजिक और व्यवहारिक दोनों तरह से रोका जा सकता है।
अगर कोई व्यक्ति इसका शिकार है तो उसे सामाजिक सहयोग देकर, धार्मिक
मान्यताओं के बारे में बताकर पूजा-पाठ में ध्यान बटाकर या योग का अभ्यास
कराकर उसे रोका जा सकता है। दूसरा कारण व्यवहारिक रूप से व्यक्ति की कथनी
और करनी में अंतर को खत्म करके साथ ही उसका आत्मविश्वास बढ़ाकर इससे मुक्ति
दिलायी जा सकती है।
संगोष्ठी
में प्रो. आरएस सिंह ने कहा कि तनाव की खोज 1956 में शेली ने नहीं की थी।
यह इससे भी बहुत पुरानी है। महाभारत के दौरान भगवान कृष्ण ने अर्जुन को
गीता का उपदेश देकर तनाव को परिभाषित किया था। युद्ध के दौरान मोह को
परिभाषित करते हुए श्रीकृष्ण ने योग और अध्यात्म में अंतर को गीता के श्लोक
से समझाया। उन्होंने कहा अगर भगवान कृष्ण नहीं होते तो ईश्वर के महत्व को
कोई नहीं बता पाता। उन्होंने बताया कि मनुष्य के केंद्र बिंदु में ही ईश्वर
विराजमान है। उनका मानना है कि योग और अध्यात्म में वही अंतर होता है जो
रास्ते और मंजिल में होता है।
सामाजिक
विज्ञान संकाय के अध्यक्ष डा. अजय प्रताप सिंह ने मुख्य अतिथि का स्वागत
करते हुए कहा कि आज तनाव पूरे समाज में व्याप्त है। इसका मुख्य कारण हर
व्यक्ति अपनी तुलना अपने बड़े से करना है। अगर हम अपने से छोटे या अपने
स्तर के व्यक्ति से अपनी तुलना करें तो नकारात्मक तनाव कभी आ ही सकता।
व्यक्ति के स्वास्थ्य को प्रभावित करने में नकारात्मक तनाव ही घातक है। इसे
अध्यात्म और योग के द्वारा ही नियंत्रित किया जा सकता है। संगोष्ठी का
संचालन डा. अवध बिहारी सिंह एवं डा. दिग्विजय सिंह राठौर ने धन्यवाद
ज्ञापित किया। इस अवसर पर डा. सुनील कुमार, सुभाष वर्मा, हरिकेश यादव, डा.
रूश्दा आजमी, पंकज सिंह सहित सामाजिक विज्ञान संकाय के विद्यार्थी मौजूद
रहे।
