महाश्मशान पर जलती चिताओं के बीच खेली गई होली

वाराणसी मान्यता है कि रंगभरी एकादशी को बाबा विश्वनाथ देवी पार्वती का गौना कराकर लौटते हैं। दूसरे दिन वह औघड़ रूप में महाश्मशान पर जलती चिताओं के बीच चिता-भस्म की होली खेलते हैं। यह परंपरा आज भी चल रही है। लोग डमरुओं की गूंज और 'हर हर महादेव' के नारे के साथ एक-दूसरे को भस्म लगाते हैं।

रविवार की सुबह महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर लोगों ने बाबा मसान नाथ को विधिवत भस्म, अबीर, गुलाल और रंग चढ़ाकर डमरुओं की गूंज के बीच भव्य आरती की। इसके बाद यह टोली चिताओं के बीच आ गई और 'हर हर महादेव' के जयकारे के बीच चिता-भस्म की होली खेली।

समिति के अध्यक्ष चैनु प्रसाद ने मान्यताओं के बारे में बताया कि औघड़दानी बनकर बाबा खुद महाश्मशान में होली खेलते हैं और मुक्ति का तारक मंत्र देकर सबको तारते हैं। मृत्यु के बाद मणिकर्णिका घाट पर जो भी दाह संस्कार के लिए आते हैं, बाबा उन्हें मुक्ति देते हैं। यही नहीं, इस दिन बाबा उनके साथ होली भी खेलते हैं।

काशी विश्वनाथ मंदिर के अर्चक श्रीकांत मिश्र ने बताया कि इस नगरी में प्राण छोड़ने वाला व्यक्ति शिवत्व को प्राप्त होता है। श्रृष्टि के तीनों गुण सत, रज और तम इसी नगरी में समाहित हैं। शास्त्रों में लिखा है कि महाश्मशान ही वो स्थान है, जहां कई वर्षों की तपस्या के बाद शि‍व ने भगवान विष्णु को संसार के संचालन का वरदान दिया था। इसी घाट पर शिव ने मोक्ष प्रदान करने की प्रतिज्ञा ली थी। यह दुनिया की एक मात्र ऐसी नगरी है जहां मनुष्य की मृत्यु को भी मंगल माना जाता है। यहां शव यात्रा में मंगल वाद्य यंत्र बजाए जाते हैं।

मंदिर के व्यवस्थापक गुलशन कपूर ने बताया कि भगवान विष्णु ने हजारों साल तक यहां तप किया था। शि‍व ने उन्हें दर्शन देकर कहा था कि आज से वह यहीं विराजेंगे। विष्णु ने अपने चक्र से चक्र पुष्कर्णी कुंड को बनाया था। इससे शि‍व ने प्रसन्न होकर स्नान किया और मौली (मस्तक) को हिलाया था। इसी बीच उनके कर्णिका (कान) से कुंडल कुंड में गिर जाता है। तभी से इस स्थान का नाम मणिकर्णिका तीर्थस्थल हो जाता है।

Related

news 2382437392683154668

एक टिप्पणी भेजें

emo-but-icon

AD

जौनपुर का पहला ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल

आज की खबरे

साप्ताहिक

सुझाव

संचालक,राजेश श्रीवास्तव ,रिपोर्टर एनडी टीवी जौनपुर,9415255371

जौनपुर के ऐतिहासिक स्थल

item