आसन शृंखला: प्रारंभिक – १
https://www.shirazehind.com/2016/08/blog-post_413.html
योगी अश्विनी
शरीर की विभिन्न प्रणालियाँ जैसे कि मासपेशीय तंत्र, कंकाल प्रणाली, तंत्रिका तंत्र व उत्सर्जन तंत्र, ये सभी आपस में तालमेल कर शरीर और उसकी कार्यव्यवस्था बनाए रखने हेतुं निरंतर कार्यशील रहते हैं | शरीर को रोगमुक्त रखने हेतु, ये आवश्यक हैं कि रोग को स्थूल शरीर में व्यक्त होने से पूर्व ही रोक दिया जाए| रोग सबसे पहले प्राणिक कोश में, जिसे 'औरा' के नाम से भी जाना जाता है, व्यक्त होता है| ध्यान आश्रम के दिव्यदृष्टा इस कोश के स्वरुप का वर्णन रंगों के रुप में करते हैं, जिसमें गाढ़ा रंग दिखना रोग का संकेत होता है| यदि इसी स्तर पर निवारण कर दिया जाए तो रोग स्थूल शरीर में व्यक्त होता ही नहीं है |सनातन क्रिया में इसके लिये तकनीक दी गईं हैं| इस लेख में हम जिन आसनों की चर्चा करेंगे वे प्रारंभिक स्थिति के आसन हैं , जो साधक के शरीर को योग के उच्चतम अभ्यास हेतु सक्षम बनाते हैं और आपको स्वस्थ, तेजस्वी, रोगमुक्त शरीर प्रदान करने में सहायता करते हैं|
अपने पैर सीधे फैलाकर बैठें| अपनी पीठ सीधी रखें और अपने दोनों पैरों और एड़ियों को जोडें | अपनी हथेलियों को ज़मीन पर कूल्हों के समीप इस तरह रखें, जिसमें आपके हाथों की अंगुलियाँ आपके शरीर से विपरीत दिशा की ओर इशारा कर रहीं हो| धीरे से श्वास अंदर लें और आपके पैरों की अंगुलियों को नीचे ज़मीन की ओर खिंचें| सात गिनने तक इस स्थिति में बैठें रहे| अब श्वास को बाहर छोड़ते हुए, दोनों पैरों की अंगुलियों को विरुद्ध दिशा में मोड़ियें| यह प्रक्रिया सात बार दोहोराएँ।
इसी स्थिति में बैठकर, आपके पैरों के पंजों का घड़ी की सूई के अनुसार पूर्णतः चक्रानुक्रम में घुमाएं, आधा चक्रानुक्रम श्वास अंदर लेते हुए करें और आधा चक्रानुक्रम श्वास बाहर छोड़ते हुए करें| यही प्रक्रिया सात बार घड़ी की सुई की दिशा अनुसार करें, फिर उसकी विपरीत दिशा में भी सात बार करें| हर चक्रानुक्रम के साथ श्वास को समक्रमिक बनाएँ रखना आवश्यक है|
इसके बाद, दाहिना पैर सीधा रखें, बायां पैर मोड़िये और एड़ी जांघ पर रखें| अपनी बाईं एड़ी को बाएँ हाथ से सहारा देते हुए पकड़ें और बाएँ पैर के पंजे को दाहिने हाथ से पकडें| अब अपनी बाईं एड़ी को सातबार घड़ी की सुई की दिशा में और फिर सात बार घड़ी की सुई की विपरीत दिशा में घुमाएं| आधा चक्रानुक्रम श्वास को अंदर लेते हुए करें और बाकी का आधाचक्रानुक्रम श्वास को बाहर छोड़ते हुए करें| यही प्रक्रिया आपके दूसरे पैर से भी करें|
ये आसान प्रतीत होनेवाले चक्रानुक्रम आपके शरीर के जोड़ों में ऊर्जा के संचालन में होनेवाली रुकावट को हटाने में अत्यंत मत्त्वपूर्ण होते हैं| अधिक लाभ के लिए इन आसनों को करते समय अपनी आँखें बंद रखें तथा अपना पूर्ण ध्यान शरीर के उस भाग पर रखें , जिसका चक्रानुक्रम किया जा रहा है|
योगी अश्विनी जी ध्यान फाउंडेशन के मार्गदर्शक है| www.dhyanfoundation.com. पर उनसे संपर्क किया जा सकता है
शरीर की विभिन्न प्रणालियाँ जैसे कि मासपेशीय तंत्र, कंकाल प्रणाली, तंत्रिका तंत्र व उत्सर्जन तंत्र, ये सभी आपस में तालमेल कर शरीर और उसकी कार्यव्यवस्था बनाए रखने हेतुं निरंतर कार्यशील रहते हैं | शरीर को रोगमुक्त रखने हेतु, ये आवश्यक हैं कि रोग को स्थूल शरीर में व्यक्त होने से पूर्व ही रोक दिया जाए| रोग सबसे पहले प्राणिक कोश में, जिसे 'औरा' के नाम से भी जाना जाता है, व्यक्त होता है| ध्यान आश्रम के दिव्यदृष्टा इस कोश के स्वरुप का वर्णन रंगों के रुप में करते हैं, जिसमें गाढ़ा रंग दिखना रोग का संकेत होता है| यदि इसी स्तर पर निवारण कर दिया जाए तो रोग स्थूल शरीर में व्यक्त होता ही नहीं है |सनातन क्रिया में इसके लिये तकनीक दी गईं हैं| इस लेख में हम जिन आसनों की चर्चा करेंगे वे प्रारंभिक स्थिति के आसन हैं , जो साधक के शरीर को योग के उच्चतम अभ्यास हेतु सक्षम बनाते हैं और आपको स्वस्थ, तेजस्वी, रोगमुक्त शरीर प्रदान करने में सहायता करते हैं|
अपने पैर सीधे फैलाकर बैठें| अपनी पीठ सीधी रखें और अपने दोनों पैरों और एड़ियों को जोडें | अपनी हथेलियों को ज़मीन पर कूल्हों के समीप इस तरह रखें, जिसमें आपके हाथों की अंगुलियाँ आपके शरीर से विपरीत दिशा की ओर इशारा कर रहीं हो| धीरे से श्वास अंदर लें और आपके पैरों की अंगुलियों को नीचे ज़मीन की ओर खिंचें| सात गिनने तक इस स्थिति में बैठें रहे| अब श्वास को बाहर छोड़ते हुए, दोनों पैरों की अंगुलियों को विरुद्ध दिशा में मोड़ियें| यह प्रक्रिया सात बार दोहोराएँ।
इसी स्थिति में बैठकर, आपके पैरों के पंजों का घड़ी की सूई के अनुसार पूर्णतः चक्रानुक्रम में घुमाएं, आधा चक्रानुक्रम श्वास अंदर लेते हुए करें और आधा चक्रानुक्रम श्वास बाहर छोड़ते हुए करें| यही प्रक्रिया सात बार घड़ी की सुई की दिशा अनुसार करें, फिर उसकी विपरीत दिशा में भी सात बार करें| हर चक्रानुक्रम के साथ श्वास को समक्रमिक बनाएँ रखना आवश्यक है|
इसके बाद, दाहिना पैर सीधा रखें, बायां पैर मोड़िये और एड़ी जांघ पर रखें| अपनी बाईं एड़ी को बाएँ हाथ से सहारा देते हुए पकड़ें और बाएँ पैर के पंजे को दाहिने हाथ से पकडें| अब अपनी बाईं एड़ी को सातबार घड़ी की सुई की दिशा में और फिर सात बार घड़ी की सुई की विपरीत दिशा में घुमाएं| आधा चक्रानुक्रम श्वास को अंदर लेते हुए करें और बाकी का आधाचक्रानुक्रम श्वास को बाहर छोड़ते हुए करें| यही प्रक्रिया आपके दूसरे पैर से भी करें|
ये आसान प्रतीत होनेवाले चक्रानुक्रम आपके शरीर के जोड़ों में ऊर्जा के संचालन में होनेवाली रुकावट को हटाने में अत्यंत मत्त्वपूर्ण होते हैं| अधिक लाभ के लिए इन आसनों को करते समय अपनी आँखें बंद रखें तथा अपना पूर्ण ध्यान शरीर के उस भाग पर रखें , जिसका चक्रानुक्रम किया जा रहा है|
योगी अश्विनी जी ध्यान फाउंडेशन के मार्गदर्शक है| www.dhyanfoundation.com. पर उनसे संपर्क किया जा सकता है
