नोटबन्दी की मार, किसानों की कमर टूटी, वकील त्रस्त

जौनपुर। नोटबंदी का सर्वाधिक असर किसानों पर पड़ा है। बैंकों से पर्याप्त धनराशि की निकासी न हो पाने से कृषि, घर का खर्च व मुकदमों की पैरवी आदि कुछ नहीं हो पा रहा है। पैसा न मिलने से वकील भी मुवक्किलों पर हाथ नहीं धर रहे हैं। मुवक्किल मुकदमों की पैरवी के अभाव में इधर से उधर भटक रहे हैं। आलम यह है कि उसे तारीख पर तारीख मिल रही है। इधर मुवक्किलों ने बिना आवश्यक काम के  कोर्ट कचहरी तक आना छोड़ दिया है। कुछ एक बड़े वकीलों को अपवाद मान लें तो ज्यादातर वकील मुवक्किलों से मुकदमों की फीस न मिलने से भी खासे परेशान हैं। कई मामलों में तो मुवक्किल अदालत द्वारा किए गए जुर्माने को भी नहीं भर पा रहे हैं। जमीन जायदाद के नए मुकदमे दायर नहीं हो रहे हैं। कारण कि वादकारी न्यायायाल की कोर्ट फीस देने की स्थिति में नहीं हैं।  किसान कहते हैं कि नोटबंदी से खेती किसानी, घर का खर्च, बच्चों की फीस, मुकदमों का खर्च कुछ भी नहीं हो पा रहा है। ऐसा लगता है कि वह जिदा होते हुए भी मुर्दा के सामान हैं। बैंक में अपना पैसा नहीं मिल पा रहा है। यही हाल कुछ दिन और रहा तो हालात बदतर हो जाएंगे। रबी की बुआई का समय है। लेकिन हाथ में पैसा न होने से बीज, खाद आदि नहीं खरीद पा रहे हैं। बैक से पैसा न मिलने से घर का खर्च चलाना भी मुश्किल हो गया है। वकील फीस न मिलने से मुकदमों की सही पैरवी नहीं कर रहे हैं। ऐसे में तारीख पर तारीख मिल रही है। वकील कहते है। हर कोई एक दूसरे से बंधे हुए हैं। बैकों से पैसा न मिल पाने के कारण मुवक्किल उन्हें फीस नहीं दे पा रहा है। जिससे उन्हें भी घर का खर्च चलाना कठिन हो रहा है। अब तो लोगों का सब्र भी टूटता जा रहा है।  यहां तक कि नोटबंदी के 40 दिन बीत चुके हैं लेकिन बैंकों में कैश नहीं है। ऐसे में मुवक्किल उन्हें फीस नहीं दे पा रहा है। मुवक्किल फीस देने के डर से तारीखों में भी नहीं आ रहा है। फोन से बहाने बना लेता है।

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