श्रेष्ठ जीवन जीना सिखाती है रामचरित मानस कथा: वशिष्ठ नारायण
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जौनपुर।
श्री शंकर आदर्श ग्रामोदय बालिका विद्यालय इमलो पाण्डेय पट्टïी के प्रांगण
में इन दिनों सात दिवसीय मानस एवं भागवत कथा चल रही है। आयोजक विद्यालय के
प्रबन्धक शीतला प्रसाद मिश्र और कथा वाचक जनपद के विद्वान व्यास द्वय मानस
मर्मज्ञ वशिष्ठï नारायण उपाध्याय और आचार्य महेन्द्र पाण्डेय हैं। कथा का
श्रीगणेश करते हुए मानस पथिक वशिष्ठï नारायण उपाध्याय ने बताया कि राम चरित
मानस हमें श्रेष्ठï जीवन जीना सिखाती है और भागवत श्रेष्ठï मरण कैसे हो,
राजा परिक्षित को आदर्श रूप में सामने रख कर यही शिक्षा देती है। उन्होंने
कहा कि रामचरित मानस का अवतरण संदेह से हुआ है। इसके चार वक्ता-भगवान
भोलेनाथ, महामुनि यागवल्क, भक्तराज-कागभुसुण्डी और गोस्वामी तुलसीदास हैं
और श्रोता हैं-भगवती उमा, ऋषि भारद्वाज, पक्षिराज गरूण और मानस प्रेमी
भक्तजन। स्वल्प विस्तार देते हुए उन्होंने कहा कि पार्वती को संदेह हुआ कि
यदि राम ईश्वर हैं तो-खोजई सो कि अज्ञ इब नारी, भारद्वाज ने संदेह किया
कि-प्रभु कोई राम कि अपर कोउ जाहि जपत त्रिपुरारी, गरूढ़ को आशंका हुई कि-
भव बन्धन से छूटई नर जप जाकर नाम सर्व निसाचर बाँधई नागपाश सोई राम। इसी
संदेह को मिटाने और जन कल्याण हेतु उक्त सभी प्रवक्ताओं ने पतित पावनी
रामकथा का गान किया। कथावाचक श्री उपाध्याय ने मानस के श्रेष्ठï भक्तों
जैसे- निषादराज गुह, गीध राज जटायू, वानर राज सुग्रीव, भक्त राज हनुमान और
भइया भरत के चरित्र का मार्मिक वर्णन कर श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया।
आचार्य महेन्द्र पाण्डेय ने भागवत कथा का प्रारम्भ प्रथम श्लोक जन्माद्यस्य
यतोन्वयादिचरत: सत्यं परम् धीमहि से किया। इसका विवेचन करते हुए बताया कि
भगवान व्यास ने माया के जंजाल से पूर्णत: मुक्त रहकर परम् सत्य रूपी
परमात्मा का ध्यान किया है जो स्थिति, पालन और प्रलय के आदि कारण है।
उन्होंने आगे कहा कि भगवान एवं भागवतम् अर्थात भागवत् ईश्वर का साक्षात्
विग्रह है। राजा परीक्षित को जब ज्ञात हुआ कि उनकी मृत्यु का वक्त मात्र
सात दिन ही शेष है तो तमाम् श्रेष्ठï ऋषियों से परामर्श कर भगवान व्यास के
बीतराग पुत्र शुकदेव से इस पावन कथा का श्रवण कर परम धाम को गये। श्री
पाण्डेय ने अपने मनोहारी प्रवचन में क्रमश: भगवान कृष्ण का प्राकट्य नंद और
यशोदा का अनुपम, स्नेह उनकी बाल लीलाओं का वर्णन, पूतना, बकासुर, आततायी
कंस बध कर आतंकवादियों के विनाश की कथा सुनाई। अंत में गजेन्द्र मोक्ष का
वर्णन कर कहा कि यदि आर्तभाव से भगवान का होकर कोई उन्हें पुकारे तो वे
दौड़ कर उसकी रक्षा के लिए उपस्थित हो जाते हैं इसमें संदेह नहीं है। दोनों
सुधी वक्ताओं की अपनी मनोरम कथाशैली और अद्भुत ज्ञान व भाव प्रधान विवेचन
से श्रोता समूह को मंत्रमुग्ध कर रखा है जिसके फलस्वरूप इस भीषण ठंड में भी
पांडाल श्रोताओं से खचाखच भरा रहता है।

