मंहगाई: आम आदमी के लिए दाल-रोटी बनी चुनौती

जौनपुर।  बाजार बेकाबू है। बेलगाम महंगाई ने निवाला छीन लिया है। त्योहारों का मौसम चल रहा है, मगर उत्साह नहीं है। कारण कि सब्जी-रोटी के लिए गरीब की अंतड़ी सूख जा रही हैं। मनरेगा की दिहाड़ी से पेट चला रहे मजदूर महंगाई से कराह रहे समाज की रीयल स्टोरी को एक जीवंत पात्र है।   सब्जी व खाद्यान्न की कीमतों को पंख लग गए हैं। जितना कमाओ कम पड़ता है। सब्जियों का दाम आसमान की ओर है। आम आदमी की थाली से टमाटर न जाने कब से गायब है। चीनी का भाव सुनकर मुंह कड़वा हो जाता है। चोखा-रोटी का जुमला अब पुराना हो चला है। आलू-प्याज की कौन कहे खाने के हर सामान की खरीदारी औकात से बाहर है। सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है। पेट की आग और जेब की मजबूरी आदमी के आक्रोश को पका रही है।  महंगाई के लिए सरकार की अव्यावहारिक नीति जिम्मेदार है। सरकार का बाजार पर नियंत्रण नहीं है। यह भी एक कारण है। प्याज 30 रुपये प्रति किग्रा है। आलू भी 12 से कम नहीं। गोभी, बैगन, बोड़ा, टमाटर, करैला, लौकी और खाद्यान्न का भाव सबके सामने है। अगर दवा कपड़ा की बात की जाए तो कोई भी आसानी से समझ सकता है कि आम आदमी की गृहस्थी कैसे चलेगी। महंगाई ने सबकी कमर तोड़ रखी है।  महंगाई ऐसे नहीं रुकेगी। इसके लिए सरकार को अपनी नीतियां बदलनी होगी। बाजार जीएसटी के गणित में उलझ गया है। आश्चर्य तो यह है कि वित्त मंत्रालय है कि महंगाई है ही नहीं और रिजर्व बैंक कह रहा है कि महंगाई बढ़ रही है। महंगाई से पूरा बाजार जल रहा है। आम आदमी की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। थोक व फुटकर की कीमतों में भारी अंतर दिख रहा है।  खाद्य वस्तुओं की कीमतों में लगातार वृद्धि होती जा रही है। ऐसे में आम आदमी के लिए दाल-रोटी भी चुनौती बनती जा रही है। शासन स्तर से जब तक ठोस पहल नहीं होगी, कुछ भी नहीं होगा। थोक व्यवसायी कहते हैं कि बाजार यदि भाग रहा है तो इसके लिए सरकार की नीति जिम्मेदार है व्यापारी नहीं। जीएसटी के चलते माल शहर से आ नहीं रहा है। लिहाजा उपलब्ध माल की कीमतें बढ़नी ही हैं।

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