क्या आज का युवा धर्म से दूर भौतिकवाद की अंधेरी खाई में खो गया है : विकास तिवारी

जौनपुर। युवाओं का धर्म तो अब फटाफट क्रिकेट, हॉलीवुड की फिल्में, कम्प्यूटर वाइरस का निर्माण, मोबाइल म्यूजिक, इंटरनेट साइट, सोशल वर्किंग नेटवर्क तथा ब्लॉग पर भड़ास निकालना और मेट्रो सिटी के पब में बीयर बार के नशे में डूब चला है। यही उनका धर्म है बाकी सब तो अधर्म है। पुरानी पीढ़ी के लोग अक्सर यह बातें कहते नजर आते हैं कि आज का युवा धर्म से दूर होकर भौतिकवाद की अँधेरी खाई में खो गया है।
कुछ युवा भी मानते हैं कि धर्म तो बुढ़े लोगों के लिए होता है। आम धारणा भी यही है कि योग, ध्यान और भजन तो बुढ़ापे में ही किया जाता है। जब 50 के पार हो जाओ तब ही कहो 'धर्म की जय हो अधर्म का नाश हो।' जब मृत्यु नजदीक हो तभी भगवान को भजो तो वैतरणी को पार करने में सुविधा होगी।
सवाल उठता है कि क्या सच में ही धर्म सिर्फ बुढ़ों के लिए है, युवाओं के लिए नहीं? और क्या सचमुच ही युवा भौतिकवाद की खाई में खो गया है। हो सकता है कुछ युवा धर्म की बातों को आधुनिकता के चलते रुढ़िग्रस्त ही समझें या यह भी हो सकता है कि आधुनिक युग में युवा धीरे-धीरे धर्म के मर्म को समझने लगा हो। मंदिर, मस्जिद या आश्रमों में बुढ़ों के साथ-साथ युवा भी तो नजर आते हैं। आखिर क्या कारण है इसका?धर्म की कट्टरपंथी सोच, धर्म के व्यावसायिकरण या किसी दुख-दर्द के चलते युवा धर्म से जुड़ने लगा है या कि सच में ही वह धर्म के मर्म को जानने लगा है?मेरा मानना है कि धर्म, ध्यान और योग ही हमे मानसिक और शारीरिक रूप से स्वथ्य बनाएँ रख सकता है। जीवन में दुख के चलते हताशा, निराशा और हिंसा बढ़ गयी है। धर्म के माध्यम से हम अपना जीवन हँसते हुए और खुशी-खुशी गुजार सकते हैं।धर्म के माध्यम से हम वैराग्य या मोक्ष प्राप्त नहीं करना चाहते, लेकिन धर्म हमें तनाव से दूर रख सकता है। प्रार्थना और ध्यान से हम स्वयं में आत्मविश्वास महसूस करते हैं। हमारी बुद्धि में शार्पनेस आती है, हम हेंगअप होने से बच जाते हैं। हम अतीत और भविष्य के बजाय वर्तमान को इंजाय करते हैं, जो इस आधुनिक युग में बहुत जरूरी है।यदि इसपे विचार किया जाय कि वैज्ञानिक युग के चलते युवाओं की दृष्टि में धर्म क्या है, धर्म की जगह कहाँ है, तो यह सच सामने आता है कि धर्म हमारे जीवन में शांति लाता है। टेंडन या डिप्रेशन को दूर करता है, जिस कारण हम अपने कार्य में ज्यादा ध्यान देकर अपने लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं।
प्रार्थना या ध्यान के माध्यम से हम स्वयं को रिलेक्स रख सकते हैं।आज का युवा भौतिकवादी सोच में तो जीता है, लेकिन वह धर्म के महत्व को भी समझता है। उसे मालूम है कि कुछ ऐसी स्प्रीचुअल बातें हैं जो विज्ञान या टेकनालॉजी से नहीं पाई जा सकती जो हमारे भीतर ही कहीं हैं। अर्थात बाहर और भीतर दोनों को साधने और सँवारने लगा है आज का युवा।

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