लुप्त हो रही संस्कृति को बचाना बड़ी चुनौती : डा.मनोज मिश्र

 जौनपुर।  बक्शा के सुजियामऊ में स्थित श्री महाकाली मंदिर पर रविवार की शाम पारंपरिक गीतों पर आधारित दस दिवसीय लोक गायन की कार्यशाला का समापन हुआ। इसमें कुल 42 प्रतिभागियों ने अपने कलां की शानदार प्रस्तुति दी। क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र वाराणसी संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित कार्यशाला में लोक गायन की विधा को सहेजने व उसे प्रस्तुतिकरण हेतु युवा टीम को प्रशिक्षित किया गया।
पूर्व ब्लाक प्रमुख श्रीपति उपाध्याय ने कहा कि लुप्त हो रही संस्कृति की इस विधा का संरक्षण एक चुनौती है। उन्होंने कहा कि गांव की लुप्त हो चुके गीत गायन को संरक्षित किया जाना प्रशंसनीय कार्य है। कार्यशाला में रामायण की पुरानी विधा वीर बानी, दशरथी बानी, पुष्प वाटिका में रस वाणी, लंका में वीर रस, लोकगीत में कमली, पूर्वी, कहरवा दादरा, खेमटा बोल, फागुन में फागुनी गीत जैसे होली, चैता, फाग, चहका, चौताल जैसे विलुप्त हो रहे गीतों को सिखाया गया।
इस दौरान गायक प्रज्ञा चक्षु बाबू बजरंगी , रामआसरे तिवारी, डा.मनोज मिश्र, ओम उपाध्याय, दुर्गेश उपाध्याय, धर्मदत्त उपाध्याय, ढोल वादक कृष्णानंद उपाध्याय, डब्लू उपाध्याय, रज्जू उपाध्याय, कैलाश शुक्ल, रामनवल शुक्ल, बड़कऊ उपाध्याय, विद्यानंद उपाध्याय, बनवासी महाराज सहित दर्जनों लोग मौजूद रहे। संचालन शिवानंद उपाध्याय ने किया। 

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