पहली धुलाई में ही स्कूल ड्रेस की शकल बिगड़ी
https://www.shirazehind.com/2018/07/blog-post_718.html
जौनपुर। सर्व शिक्षा अभियान के तहत केंद्र सरकार कक्षा 8 तक के परिषदीय विद्यालयों तथा सहायता प्राप्त कालेजों के बच्चों को दोपहर के भोजन के साथ साथ ,किताब और छात्र ,छात्राओं के लिए दो सेट ड्रेस प्रति छात्र 400 रुपये के हिसाब
से वितरित करा रही है । बच्चांे में वितरित किये जा रहे ड्रेस की क्वालटी घटिया है कि पहली ही धुलाई में ड्रेस बदरंग हो गये और उसमें रोयें निकलने लगे हैं । जिसका सबसे बड़ा कारण ड्रेस सप्लायर और संबंधित विद्यालयों के प्रधानाध्यापक के बीच जमकर कमीशन बाजी होना है । प्रति छात्र ड्रेससप्लायर 60 ,65 से लेकर 70 रुपये कमीशन ले रहे है । ड्रेस की गुणवत्ता से किसी को कोई लेना देना नही है। जो सप्लायर सबसे ज्यादा कमीशन देगा ,उसी से प्रधानाध्यापक से लेकर सहायता प्राप्त विद्यालय के प्रबंधक ड्रेस ले रहे है । ऐसा नही है कि यह विभागीय जिम्मेदारों को नही पता है । सभी को बखूबी पता है किंतु ऐसे लोग उनका निर्धारित हिस्सा नियत समय पर उन तक पहुंचा देते है । दरअसल टेंडरिंग का काम विद्यालयों का होता है किंतु सप्लायर स्वयं अपने ढंग से ऐसे अखबारों में टेंडर निकलावा दे रहे है ,जिनकी जानकारी अन्य किसी को हो ही नही पाती । नियम है कि जिस विद्यालय में 100 से अधिक बच्चों का नामांकन है । उस विद्यालय के प्रधानाध्यापक या प्रबंधक ऐसे दो अखबारों में विज्ञापन निकलवाएँगे जिसे जनपद के हर क्षेत्र में लोग पढ़ते हो किन्तु इस नियम की धज्जियां खुले आम उड़ाई जा रही है। विज्ञापन के बाद कम से कम तीन सप्लाई एजंसियां अपना कोटेशन तथा सैम्पल देते है । फिर शिक्षा समिति क्वालटी के आधार पर प्रस्ताव पारित करती है कि किस एजेंसी से ड्रेस लेना है। पूरे जनपद में नियमो की धज्जियां जिम्मेदारों की आंख के सामने और नाक के नीचे उड़ाई जा रही है । वही सप्लायर फर्जी कोटेशन भी लाकर दे रहे है ।
से वितरित करा रही है । बच्चांे में वितरित किये जा रहे ड्रेस की क्वालटी घटिया है कि पहली ही धुलाई में ड्रेस बदरंग हो गये और उसमें रोयें निकलने लगे हैं । जिसका सबसे बड़ा कारण ड्रेस सप्लायर और संबंधित विद्यालयों के प्रधानाध्यापक के बीच जमकर कमीशन बाजी होना है । प्रति छात्र ड्रेससप्लायर 60 ,65 से लेकर 70 रुपये कमीशन ले रहे है । ड्रेस की गुणवत्ता से किसी को कोई लेना देना नही है। जो सप्लायर सबसे ज्यादा कमीशन देगा ,उसी से प्रधानाध्यापक से लेकर सहायता प्राप्त विद्यालय के प्रबंधक ड्रेस ले रहे है । ऐसा नही है कि यह विभागीय जिम्मेदारों को नही पता है । सभी को बखूबी पता है किंतु ऐसे लोग उनका निर्धारित हिस्सा नियत समय पर उन तक पहुंचा देते है । दरअसल टेंडरिंग का काम विद्यालयों का होता है किंतु सप्लायर स्वयं अपने ढंग से ऐसे अखबारों में टेंडर निकलावा दे रहे है ,जिनकी जानकारी अन्य किसी को हो ही नही पाती । नियम है कि जिस विद्यालय में 100 से अधिक बच्चों का नामांकन है । उस विद्यालय के प्रधानाध्यापक या प्रबंधक ऐसे दो अखबारों में विज्ञापन निकलवाएँगे जिसे जनपद के हर क्षेत्र में लोग पढ़ते हो किन्तु इस नियम की धज्जियां खुले आम उड़ाई जा रही है। विज्ञापन के बाद कम से कम तीन सप्लाई एजंसियां अपना कोटेशन तथा सैम्पल देते है । फिर शिक्षा समिति क्वालटी के आधार पर प्रस्ताव पारित करती है कि किस एजेंसी से ड्रेस लेना है। पूरे जनपद में नियमो की धज्जियां जिम्मेदारों की आंख के सामने और नाक के नीचे उड़ाई जा रही है । वही सप्लायर फर्जी कोटेशन भी लाकर दे रहे है ।

