गुम होती संस्कृति
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गार्गी सिंह
भारतवर्ष
एक परिवार है। इस परिवार में विभिन्न योग्यता के लोग निवास करते थे।
परिवार को सुगमता से चलाने व सुरक्षित रखने के लिये विचार-विमर्श द्वारा
महत्व पूर्ण निर्णय लिये गये थे। परिवार के सदस्यों में कार्यों का विभाजन
उनकी योग्यता के अनुसार किया गया था। जैसे ज्ञान परामर्श देने के कार्य,
अराजक तत्व से लड़ने के कार्य, घर गृहस्थी के कार्य सहित अन्य कार्य। एक
परिवार को सांस्कारिक सभ्य परिवार की संज्ञा तभी दी जा सकती है। जब परिवार
के सभी सदस्यों में सामंजस्य हो और वह अपने कार्य को उत्तरदायित्व कर्तव्य
बोध के साथ खुशी से करते हो। आज विघटन की स्थिति उत्पन्न हो गयी। लोग
दूसरों को शिक्षा देते हैं, फिर उनका कार्य स्वयं करने की कोशिश करते हैं।
अंतिम प्रयास में भी असफल सिद्ध होते हैं परन्तु वही कार्य करते दिखते हैं।
आपसी सामंजस्य की कमी के फलस्वरूप ज्ञानी गृहस्थ कार्य, शक्तिशाली अन्य
कार्य, गृहस्थ शक्ति प्रदर्शन सहित अन्य कार्य करने वाले ज्ञान देने लगे
हैं। अर्थात वर्तमान में ज्ञान की परिभाषा बदल गयी। गृहस्थी विकृत
गुणवत्तापूर्ण, शक्ति का दुरुपयोग सहित अन्य कार्य बाधित है। आपसी मनमुटाव
पड़ोसी को परिवार तोड़ने और अपना फायदा उठाने का मौका दे रहा है। भारत देश
विभिन्न जाति, संस्कृतियों, सभ्यता का देश है। सबकी अपनी विशेषता व योग्यता
है। आज परिवार के सदस्यों की संख्या (भारत की जनसंख्या) अधिक है परन्तु
एक-दूसरे के प्रति भावनाएं समान होनी चाहिये। तभी परिवार अन्य परिवार के
बीच मजबूत दिखायी देगा। दुख व सुख जीवन के दो पहलू हैं। जिस प्रकार कोई एक
रंग पसंद होने पर भी हम किसी एक रंग के वस्त्र जीवन भर धारण करना पसंद नहीं
करते हैं। इसी प्रकार प्रकृति ने भी दुःख सुख की क्रमशः व्यवस्था बनायी
है। यह प्रकृति का नियम है। जीवन से परेशान हो अपने भाई-बन्धुओं से वैचारिक
मतभेद परिवार में ठीक नहीं यह विनाश का सूचक है। अपने संस्कारो के लिये ही
हमारा देश विश्व विख्यात है। विषय विशेषज्ञ हो तो ही ज्ञान दें एवं किसी
भी तरह की योग्यता का ज्ञान विषय विशेषज्ञों से ही लें, अन्यथा आप तो डूब
ही रहे हैं। गलत ज्ञान से औरों को भी डूबा सकते हैं। कृपया इस परिवार की
खूबसूरती को बनाये रखने का कर्तव्य हमारा आपका ही है।
(लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

