अन्तिम सोमवार को उमड़ा आस्था का सैलाब
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जौनपुर । सावन में सोमवार दिन का विशेष महत्व होता है। इस सावन की अंतिम सोमवार होने के कारण शिवमंदिरों में आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। बाबा भोलेनाथ का जलाभिषेक करने के लिए श्रद्धालु सवेरे से ही मन्दिरों में पहुंचकर, गाय का दूध, बेलपत्र, धतूर, मदार, माला फूल तथा विभिन्न प्रकर के फल बाबा को अर्पित कर रहे थे तथा अनेक स्थानों रूद्राभिषेक किया गया। कांवरियो जलाभिषेक के लिए बड़ी संख्या में दिखाई दिया, इससे बोलबम के नारे की गूंज चोरों तरफ सुनाई दे रहे थे। शिव मंदिरों पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ साथ ही विशेष पूजा पाठ का आयोजन किया गया है। इस बार बाबा का दरबार पूरी तरह से अलग दिखाई दे रहा था। बाबा के भक्त दर्शन-पूजन के लिए कतार में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करते रहे। महिला, पुरुष संग बच्चे भी औघड़दानी की एक झलक पाने को आतुर रहे। इस पावन अवसर पर शिव मंदिरों में रूद्रभिषेक की भी होड़ रही। ज्ञात हो कि सावन माह में शिव जी की महत्ता और भी बढ़ जाती है। भगवान शंकर की आराधना करने के पूर्व यह ज्ञात करना अत्यंत आवश्यक है कि उन्हें देवाधिदेव क्यों माना जाता है। इस पर गहनता से विचार करने पर स्वतरू स्पष्ट हो जाता कि भोलेनाथ सहजता व सरलता के देवता हैं। उनकी पूजा और आराधना स्थल सुख के निमित्त नहीं बल्कि आंतरिक सौरव्य व आह्लाद के लिए किया जाए तो श्रेष्ठ होगा। महज महादेव ही ऐसे देवता हैं जो अपने भक्तों को सिर पर बैठाते हैं। स्पष्ट है कि अपनी जान की परवाह किए बिना भस्मासुर और रावण को मनोवांछित वरदान दे दिए। जब भी भगवान शंकर के शिव¨लग स्वरूप की पूजा होती है तो वे जल, अक्षत, धतूरा और बेलपत्र से प्रसन्न हो जाते हैं। यदि सांसारिक जीवन में कोई श्रेष्ठ पदधारी न्यूनतम श्रद्धा से प्रसन्न हो जाए तो समाज उसका ऋणी हो जाता है। जल चढ़ाने का आशय मन की तरलता से भी है। महादेव के पुत्र गणेश जी भी इन्हीं गुणों से प्रथम देवता बन गए। भारी भरकम व्यक्तित्व के बावजूद उन्होंने अपना वाहन एक चूहे को बनाया जबकि सामाजिक जीवन में भारी भरकम ओहदे वाला व्यक्ति भारी वाहन और काफिले के साथ आता है। गणेश जी भी सिर्फ दूब चढ़ाने से प्रसन्न हो जाते हैं। शिव के परिवार में वाहन बैल, शेर, चूहा व उनके गले में लिपटे नाग एक दूसरे के दुश्मन हैं परंतु शिव के परिवार में ये सभी आपस में प्रेम से रहते हैं। अर्थात हमें भी परिवार व समाज में सामंजस्य बैठाकर रहना चाहिए। अमर कथा सुनाने की जब बारी आई तो महादेव ने सबकुछ त्याग दिया। भौतिक वस्तुओं के संग्रह में प्रायः जीवन का रस रिक्त हो जाता है। हम सभी को सावन की विशेषता व शिव के कर्म व त्याग से प्रेरणा लेनी चाहिए।
