त्रिकालदर्शी औरतत्त्व द्रष्टा थे महर्षि बाल्मीकि

जौनपुर। सुइथाकला  राम चरन सिंह इण्टरमीडिएट कालेज रवनियां में बाल्मीकि की जयन्ती मनायी गयी और उनके ब्यक्तित्व व कृतित्व पर प्रकाश डाला गया । कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए विद्यालय के प्रधानाचार्य डॉ0 अजेय प्रताप सिंह ने कहा कि महर्षि बाल्मीकि युग-पुरुष,त्रिकालदर्शी,तत्व द्रष्टा एवं आदि कवि थे।रामायण जैसे महान ग्रन्थ के प्रणेता महर्षि बाल्मीकि का जन्म आश्विन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को हुआ था।प्रारम्भिक जीवन में वे पथिकों को लूट कर अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे।एक दिन जब जंगल के रास्ते से जा रहे साधुओं को लूटने की नियत से उन्हें रोका उन्हें रोका तो साधुओं ने उनसे पूछा कि तुम पथिकों को लूट कर अधर्म और पाप से धनोपार्जन करके अपने परिवार का भरण-पोषण करते हो तो क्या तुम्हारे पाप कर्मो के सहभागी तुम्हारे परिवार वाले भी होंगे? इस प्रश्न के उत्तर की जिज्ञासा लेकर जब बाल्मीकि अपने परिवार वालों से पूछा तो तो परिवार वालों ने कहा कि जब पाप कर्म तुम कर रहे हो तो उसका फल तुम्हें ही भोगना होगा यह सुनकर उनके ज्ञान चक्षु खुल गए और लौटकर साधुओं को मुक्त करते हुए उनके चरणों पर गिर पड़े तथा उनसे क्षमा मांगी। इसी एक घटना से बाल्मीकि का पूरा जीवन परिवर्तित हो गया।  शिक्षक विमलेश कुमार शुक्ल ने कहा कि महर्षि बाल्मीकि ने कठोर तप करके अपने पापों का प्रायश्चित किया तपस्या में लीन रत्नाकर के शरीर पर दीमकों ने अपना घर बना लिया ।तप की पराकाष्ठा से प्रसन्न ब्रह्मा के आदेश से इंद्र ने जल की वर्षा करके उनका शरीर धो दिया उनके शरीर में दीमकों के स्थान बना लेने से उनका नाम बाल्मीकि और इंद्र के जल की वर्षा से शरीर धुलने के कारण उनका नाम प्राचेतस हुआ।एक बार तमसा नदी से स्नान करके लौटते समय महर्षि बाल्मीकि ने एक बहेलिया द्वारा क्रौंच पक्षी को मार दिए जाने पर क्रांति के करुण क्रंदन को सुनकर अनायास हीं उनके मुख से अनुष्टुप छंद के रूप में यह श्लोक निकल पड़ा-मा निषाद प्रतिष्ठां त्वं  गमः शास्वती समारू।यत् क्रौंचं मिथुनादेकम् अवधी काम मोहितम्।।इसके बाद उन्होंने भगवान की प्रेरणा से  से संस्कृत भाषा में प्रसिद्ध महाकाव्य रामायण की रचना की और आदि  कवि  बाल्मीकि के रूप में अमर हो गए ।रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी अयोध्या कांड में राम और बाल्मीकि के  मिलन का वर्णन किया है -देखत बन  सर शैल सुहाये। बाल्मीकि आश्रम प्रभु आए । आश्रम पहुंच कर स्वयं अखिल ब्रह्माण्ड  नायक परमात्मा के रूप में श्री रामचंद्र जी स्वयं उनकी महिमा का गान करते हुए कहते हैं-तुम त्रिकालदर्शी मुनि  नाथा। विश्व बदर  जिमि  तुम्हरे हाथा। और अपने निवास योग्य स्थान भी उन्हीं से पूछते हैं । भगवान श्री रामचंद्र जी के गूढ़  प्रश्नों को सुनकर उनका उत्तर देते हुए महर्षि बाल्मीकि  कहते हैं -पूॅछेहूं मोहिं कि रहौं कहं, मैं पूछत सकुचांउॅ। जहॅ न होहुं तहं देहुं कहि, तम्हहिं देखावौं ठाउं।।  डाॅ.मनोज कुमार सिंह,डाॅ.डी.पी. सिंह,जगदीश,देवेन्द्र बहादुर सिंह, अरूण कुमार सिंह,शक्ति प्रकाश सिंह  विजय सिंह,एस.पी.सिंह,नरेन्द्र कुमार सिंह,कृष्ण मन,घनश्याम पाण्डेय,माता प्रसाद तिवारी,रूद्रेश सिंह, रवीन्द्र सिंह,सौरभ सिंह ,शिव प्रसाद सिंह,अरविंद पाल आदि उपस्थित रहे।

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