चलों गाँव की ओर, पढ़िए दिलचस्प स्टोरी
https://www.shirazehind.com/2020/04/blog-post_530.html
मुम्बई मे बाढ़ से आयी त्रासदी हो या कोरोना वायरस की महामारी हो, ऐसे समय मे लोग अपने जीवन को बचाने मे लग जाते है और पुनः उन्हे याद आता है तो सिर्फ “गाँव” | विगत 2 से 3 दशकों मे गावों से लोगों का तेजी से पलायन हुआ है वजह जीविका चलना कम बल्कि आधुनिक सुख सुविधाओं को पाना अत्यधिक रहा है | कुछ लोग अच्छी शिक्षा स्वास्थ्य सेवाओं के लिए भी गाँव से शहर का रूख कर रहे है | सबसे अधिक पलायन करने वाले राज्यों मे उत्तर प्रदेश और बिहार के निवासी आते है जहां जनसंख्या, बेरोजगारी के साथ साथ आधुनिकीकरण का प्रभाव लोगों के जेहन मे अत्यंत गहरा होता चला जा रहा है | अनुमानतः वर्तमान समय मे भी 60 प्रतिशत लोग गाँव मे रह रहे है जबकि 40 प्रतिशत शहरों मे |
गाँव की चुनौती जहां कम है वही शहर की अपनी अलग चुनौती है जो कई रूपों मे है | जहां पैसा तो है पर जीवन के लिए बेहतर साधन पाना सबके बस मे नहीं | मुम्बई मे एक छोटे से कमरे मे 5 से 6 लोग तक रहते है | ये ऐसे लोग है जो अपने परिवार को छोड़ कर हजारों किलोमीटर दूर इस उद्देश्य से आते है की उनका जीवन बेहतर हो जाए| पारिवारिक जरूरते पूरी हो जाएं | पर जमीनी सच्चाई कुछ और है | अधिकांश लोगों का न जीवन बेहतर होता है और न उद्देश्यों की पूर्ति, क्योंकि शिक्षा का व्यापक अभाव रहता है |
गाँव मे लोगों का जीवन भले ही शहरों की अपेक्षा आधुनिक न हो पर खुला स्वच्छ वातावरण, प्राकृतिक संसाधन की प्रचुर मात्र, सामाजिक मूल्य, पारिवारिक एकता और मेहनत करने की मजबूत इच्छा शक्ति इन्हे न केवल औरों से अलग रखता है बल्कि इस बात पर विचार करने पर बल देता है की गाँव ही रहने को सर्वश्रेष्ठ क्यों है | गाँव मे गला काट प्रतिस्पर्धा नहीं दिखेगी, गाँव मे लोगों की आवश्यकताएं सीमित है, लोगों की इच्छा अच्छे कर्मों के प्रति सजग है | एक दूसरे की मदद को तत्पर रहते है | सम्मान देना और पान हर व्यक्ति मे मिल जाएगा |
आज समय की मांग और जरूरत भी है की लोग आत्म निर्भर बने | देश के प्रधानमंत्री जी ने पिछले एक माह मे कई बार लोगों से आत्म निर्भर बनने की बात पर विशेष बल दिया है | अंतर्राष्ट्रीय निर्भरता समाप्त हो | जीवन को स्वस्थ्य और खुशहाल बनाया जाए | इन सब की पूर्ति गाँव से ही हो सकती है | जरूरत है तो लोगों तक अच्छी शिक्षा, रोजगार के अवसर, उचित स्वास्थ्य व्यवस्था, याता-यात संसाधन के साथ – साथ गाँव के विकास पर विशेष बल देने की और यह तभी संभव है जबकि गाँव के लोगों के साथ-साथ स्थानीय, और राष्ट्रीय सत्ताधारी पार्टी द्वारा उचित कार्यवाही इस दिशा मे की जाए |
कोरोना वायरस की इस महामारी मे न केवल लोगों पर मुशीबत है बल्कि उद्योग-धंधे बंद चल रहे है वजह अधिकांश उद्योग शहर या उसकी बाहरी सीमा पर स्थित है | कोरोना वायरस से प्रभावित शहरी क्षेत्र अत्यधिक है | ऐसे मे यदि ये उद्योग-धंधे गाँव मे होते तो न केवल उनका काम निर्बाध चलता रहता बल्कि लोगों की अपनी जरूरतों की पूर्ति के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल रही होती | और हम सब इस त्रासदी मे भी मजबूत रूप से डटे रह सकते थे |
आज लाखों मजदूर बिना कुछ विचार कीये गाँव आने की आकांक्षा मे पल-पल जीवन व्यतीत कर रहें है | एक बार वापस आने के पश्चात उनमे से कई पुनः पलायन की नहीं सोच पायेगे | कई ऐसे लोग भी है जो इस महामारी से सबक लेते हुए गाँव को ही अपना केंद्र बिन्दु बना कर रहेगे | ऐसे मे अब जरूरत है की सरकार और निजी कम्पनियों को गाँव की तरफ रूख करना चाहिये जिससे रोजगार के साथ-साथ, भविष्य मे आने वाली इस तरह की महामारी से बचा जा सके और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सके | सोचिएगा जरूर क्यों न हम सब चलें “गाँव की ओर”
डॉ. अजय कुमार मिश्रा (लखनऊ)
गाँव की चुनौती जहां कम है वही शहर की अपनी अलग चुनौती है जो कई रूपों मे है | जहां पैसा तो है पर जीवन के लिए बेहतर साधन पाना सबके बस मे नहीं | मुम्बई मे एक छोटे से कमरे मे 5 से 6 लोग तक रहते है | ये ऐसे लोग है जो अपने परिवार को छोड़ कर हजारों किलोमीटर दूर इस उद्देश्य से आते है की उनका जीवन बेहतर हो जाए| पारिवारिक जरूरते पूरी हो जाएं | पर जमीनी सच्चाई कुछ और है | अधिकांश लोगों का न जीवन बेहतर होता है और न उद्देश्यों की पूर्ति, क्योंकि शिक्षा का व्यापक अभाव रहता है |
गाँव मे लोगों का जीवन भले ही शहरों की अपेक्षा आधुनिक न हो पर खुला स्वच्छ वातावरण, प्राकृतिक संसाधन की प्रचुर मात्र, सामाजिक मूल्य, पारिवारिक एकता और मेहनत करने की मजबूत इच्छा शक्ति इन्हे न केवल औरों से अलग रखता है बल्कि इस बात पर विचार करने पर बल देता है की गाँव ही रहने को सर्वश्रेष्ठ क्यों है | गाँव मे गला काट प्रतिस्पर्धा नहीं दिखेगी, गाँव मे लोगों की आवश्यकताएं सीमित है, लोगों की इच्छा अच्छे कर्मों के प्रति सजग है | एक दूसरे की मदद को तत्पर रहते है | सम्मान देना और पान हर व्यक्ति मे मिल जाएगा |
आज समय की मांग और जरूरत भी है की लोग आत्म निर्भर बने | देश के प्रधानमंत्री जी ने पिछले एक माह मे कई बार लोगों से आत्म निर्भर बनने की बात पर विशेष बल दिया है | अंतर्राष्ट्रीय निर्भरता समाप्त हो | जीवन को स्वस्थ्य और खुशहाल बनाया जाए | इन सब की पूर्ति गाँव से ही हो सकती है | जरूरत है तो लोगों तक अच्छी शिक्षा, रोजगार के अवसर, उचित स्वास्थ्य व्यवस्था, याता-यात संसाधन के साथ – साथ गाँव के विकास पर विशेष बल देने की और यह तभी संभव है जबकि गाँव के लोगों के साथ-साथ स्थानीय, और राष्ट्रीय सत्ताधारी पार्टी द्वारा उचित कार्यवाही इस दिशा मे की जाए |
कोरोना वायरस की इस महामारी मे न केवल लोगों पर मुशीबत है बल्कि उद्योग-धंधे बंद चल रहे है वजह अधिकांश उद्योग शहर या उसकी बाहरी सीमा पर स्थित है | कोरोना वायरस से प्रभावित शहरी क्षेत्र अत्यधिक है | ऐसे मे यदि ये उद्योग-धंधे गाँव मे होते तो न केवल उनका काम निर्बाध चलता रहता बल्कि लोगों की अपनी जरूरतों की पूर्ति के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल रही होती | और हम सब इस त्रासदी मे भी मजबूत रूप से डटे रह सकते थे |
आज लाखों मजदूर बिना कुछ विचार कीये गाँव आने की आकांक्षा मे पल-पल जीवन व्यतीत कर रहें है | एक बार वापस आने के पश्चात उनमे से कई पुनः पलायन की नहीं सोच पायेगे | कई ऐसे लोग भी है जो इस महामारी से सबक लेते हुए गाँव को ही अपना केंद्र बिन्दु बना कर रहेगे | ऐसे मे अब जरूरत है की सरकार और निजी कम्पनियों को गाँव की तरफ रूख करना चाहिये जिससे रोजगार के साथ-साथ, भविष्य मे आने वाली इस तरह की महामारी से बचा जा सके और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सके | सोचिएगा जरूर क्यों न हम सब चलें “गाँव की ओर”
डॉ. अजय कुमार मिश्रा (लखनऊ)

