बरसात की वह रात
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कल रात से रिमझिम बारिश हो रही है। सुबह के कामों से फ्री हो लॉन में आई तो मुस्कराते फूलों ने जोश खरोश से मेरा स्वागत किया। अपने नन्हें से बगीचे में खिले फूलों को निहारते हुए उन्हें सहला ही रही थी कि कमरे में बजते रेडियो पर उद्धोषक की आवाज कानों में पड़ी। अब आप 'राग कल्याण' में फिल्म 'बरसात की रात' का एक गीत सुनिये, जिसके गीतकार है साहिर लुधियानवी, संगीतकार हैं रोशन और जिसे अपनी मधुर आवाज में गाया है लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी ने। जिन्दगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात...। रेडियो पर गीत बज रहा है और मैं गीत सुनते सुनते अतीत की गलियों में खो गई। शैलेंद्र! मेरे बचपन का साथी। बरसों से एक ही गली में रहते आए। सारा दिन कैरम, पकड़न पकड़ाई, लूडो खेलते और आपस में तू तू मैं मैं करते हुए हम साथ—साथ बड़े हुए।आजकल शेलेंद्र की मम्मी ने एक नया राग अलापा हुआ है।
"अरे! इतने छोटे घर में अब गुजारा नहीं होता । बच्चे जवान हो रहे हैं, उन्हें भी तो अपना स्पेस चाहिए न! मैंने तो इन्हें कह दिया है बस अब हमें बड़ा घर चाहिये ही चाहिए।" शैलेंद्र की मम्मी हाथ हिलाते हुए नॉन स्टॉप अपनी ही रौ में बोलती चली जातीं और हम उनकी एक्टिंग देख मुँह पर हाथ रख हँसी रोकने की कोशिश करते रहते। सचमुच एक दिन वे लोग साथ वाली कालोनी में शिफ्ट हो गये। शिफ्ट क्या! कहने भर को ही शिफ्ट हुए, आंटी अंकल डिनर कर बिना नागा गली में सभी को मिलने आते। बरसों से साथ रहते हुए सभी से जो बहनापा सा हो गया था, वह आसानी से कहाँ छूटने वाला था भला। शैलेंद्र रोज न आता, बस कभी कभार किसी इतवार को आता, वह भी तब जब उसकी मम्मी कोई बढ़िया सी डिश बनाती तो वह शैलेंद्र के हाथ हमारे घर भिजवा देती।
आज शैलेंद्र दही भल्ले देने आया है। दरवाजा मैंने ही खोला। मुझे देखकर वह पल भर को चौंक सा गया। पता नहीं क्यों? फिर वह अक्सर अंकल आंटी के साथ आने लगा। अब वह पहले सा नहीं रहा, कुछ कुछ बदल गया है। गली में सारा दिन लड़ने झगड़ने वाले हम। कब हम दोनों में प्रेम पनपा, हम दोनों ही न जान पाए । जब तक प्रेम न था खूब बहस करते एक-दूसरे को मात दे अपनी बात उँची रखने की होड़ रहती हम दोनों में लेकिन जैसे-जैसे प्रेम का अहसास तारी होता गया, एक मीठी सी कसक ने लड़ाई झगड़े की जगह ले ली। एक—दूसरे को मात देने की बजाय अब एक दूसरे को छिप छिपकर निहारना ही जीवन का एकमात्र ध्येय बन गया हो जैसे।
एक इतवार को गली में खूब हो-हल्ला मचा। कारण! हमारे घर से दो घर छोड़ रहने वाले शर्मा अंकल के बेटे मधुर भैया को लड़की वाले देखने आये थे। "अरे! अभी तक तो लड़के वाले ही लड़की देखने जाते हैं, ये क्या नयी रीति निकाली शर्मा जी ने!" पूरी गली की औरतें एक जगह टोली बनाकर बात का बतंगड़ बनाने में व्यस्त थी तो वहीं दूसरी ओर गली के मर्द भी भला कौन से कम थे। वे भी अपनी टोली बनाकर इस टॉपिक पर चर्चा करने में मशगूल थे। बच्चे तो बस यहाँ से वहाँ और वहाँ से यहाँ धमाचौकड़ी मचाने में व्यस्त। रह गए हम लोग- मैं, शैलेंद्र, पूजा, रोहित और श्याम ! जो न बड़ों में शामिल न बच्चों में।
मधुर भैया की शादी की शहनाइयां अभी से हम लोगों के कानों में बजने लगी थी। मैंने कनखियों से शैलेंद्र की ओर देखा। वह भी चोर नजरों से मुझे ही देख रहा था। शादी शब्द ने हम दोनों को एक कदम और नजदीक ला खड़ा कर दिया था। यौवन की दहलीज पर खड़े हम दोनों के लिये शादी शब्द एक सुखद सलोने भविष्य का संकेत था। सब कुछ कितना रूमानी था न! "बधाई हो बधाई!"
मधुर भैया के घर से आती आवाजों ने मेरी तंद्रा भंग की। गपबाजी में मस्त सभी की नजरें मधुर भैया के घर कौतूहल से उठी । इतने में शर्मा अंकल मिठाई का डिब्बा हाथ में लिये बाहर आये और खुशी से चिल्लाये। "लो जी सारे मुँह मीठा करो! अब हम भी बहू वाले बनने वाले हैं!" उनकी इस बात पर सब खूब खिलखिलाकर हँसे और मिठाई के डिब्बे पर टूट पड़े। दो महीने बाद शादी की तारीख निश्चित हुई। दो महीने मानो पलों में ही निकल गये। मैं और शैलेंद्र अति उत्साही थे जैसे शादी मधुर भैया की न होकर हमारी हो। ये जवानी का जोश था या हमारी गली की पहली शादी की खुशी! जो भी हो, पूरी गली जोर-शोर से तैयारियों में जुटी थी। "तू क्या पहनेगी?" शैलेंद्र ने पूछा तो मैंने भी झट कहा
"जो तुम कहो!" "सच्ची ! जो मैं कहूँ वो मानेगी?" "कोई शक!" "तो लाल रंग का शरारा पहनना!" "पागल! मेरी शादी थोड़े ही है!" मैं छुई-मुई सी शरमा गई। "मैं तुझे लाल जोड़े में देखना चाहता हूँ।" "जब समय आएगा तो लाल जोड़े में भी देख लेना। अभी तो साड़ी पहनूंगी!" "आए लव साड़ी!" कहते हुए शैलेंद्र ने आँखें झपकाई और अदा से मुस्कुराया तो मैं यूँ लजा उठी मानो वह मेरा दूल्हा हो।
"सुन! ये तो बता किस रंग की साड़ी लेगी? मैं भी उसी रंग का कुर्ता पहनूंगा।" शैलेंद्र की इस बात ने मुझे भीतर तक आह्लादित कर दिया। जाने ये उम्र का असर था या सिनेमा का! जो भी हो ये पल बेहद अनमोल थे। आँखों के आगे धर्मेद्र हेमामालिनी की लाजवाब जोड़ी आ खड़ी हुई। "नीले रंग की!" कहते हुए मैं रसोई की ओर बढ़ गई। शैलेंद्र की मुस्कान दूर तक मेरा पीछा करती रही। आज शादी का दिन भी आन पहुँचा। मिन्नतें कर करके माँ को मनाया और आज पहली बार ब्यूटी पार्लर से तैयार होने गई। मधुर भैया की शादी से ज्यादा मुझे अपने और शैलेंद्र के हीरो हीरोइन की तरह मैचिंग कपड़े पहन तैयार होने की खुशी ज्यादा थी। उस दिन ब्यूटी पार्लर में खूब भीड़ थी। "आज शादियों का भारी साया है।"
किसी ने भीड़ में कहा तो मुझे हँसी आ गई। "शादियों का भी साया होता है क्या?" रब का नाम लेते हुए मेरा नम्बर आया, ब्यूटी पार्लर वाली ने तैयार करने में काफी समय लगाया। इस बीच छोटी बहन दो चक्कर लगा गई। "दीदी सब तैयार हो गये। जल्दी करो। माँ नाराज हो रही है।" "दीदी गली के सभी लोग चले गये। बस एक चक्कर और लगेगा शर्मा अंकल की गाड़ी का।" मैं पार्लर वाली को जल्दी मचाने लगी तो उसने भी डाँट दिया। "शांति से बैठो । नहीं तो फिर कहोगी कि अच्छा मेकअप नहीं किया । सब जगह बदनामी तो हमारी ही होगी न!" मेकअप तो मुझे बढ़िया ही चाहिए था तो मैं भी चुप लगाकर बैठ गई। तीसरी बार माँ खुद आ गयी। "हद है तेरी! इतनी देर लगती है तैयार होने में! बेकार के चोंचले। तेरे पापा बहुत नाराज हो रहे हैं। मैं उनके साथ जा रही हूँ तू रमा चाची ले साथ अगले चक्कर में आ जाना।" "ठीक है! आप चिंता न करो। पहुँच जाऊँगी।" लड़की वालों का घर केवल दो किलोमीटर ही दूर था। रमा चाची जाते हुए मुझे साथ ही ले जाएंगी, ये सोचकर मैं भी निश्चिंत हो बैठ गयी। तैयार होकर जब खुद को शीशे में देखा तो मैं खुद पर ही मोहित हो उठी।
कजरारी आँखें, सुंदर सा हेयरस्टाइल, करीने से बंधी साड़ी... मैं सचमुच खुद को हेमा मालिनी ही समझने लगी और इतराती हुई पंख लगा मानो हवा में भी उड़ने लगी थी।
आठ बजने को आए पर रमा चाची नहीं आई। "अरे कहीं मुझे भूल तो नहीं गई साथ ले जाना!" इस विचार से ही मेरे होश फाख्ता हो गये। मैंने घबरा कर अपनी गली की ओर कदम बढ़ाये। शर्मा अंकल का घर खूबसूरत लड़ियों से जगमगाता हुआ मुस्कुरा रहा था और बाकी गली बिलकुल सुनसान पड़ी थी। "तो क्या सब गए!" मेरे पैरों तले से जमीन खिसकने लगी। घबराहट से माथे से पसीना चुहने लगा। सारा मोहल्ला घूमता सा लगा। एक पल को लगा मैं धम्म से गिर ही जाऊँगी। अचानक मुझे अपने पीछे तेज हॉर्न सुनाई दिया। मुड़कर देखा पर तेज लाईट में कुछ न दिखा। तभी शैलेंद्र गाड़ी से उँची आवाज में मुझे डांटते हुए उतरा। "कितनी देर से आवाजें लगा रहा हूँ, ध्यान कहाँ हैं तुम्हारा?" मेरे करीब आते ही वह एक पल को थम गया। "गीता! ये तुम ही हो न!" सारी घबराहट पल भर में उड़न छू हो गई। "तुम तो पहचानी ही नहीं जा रही! बहुत बहुत सुंदर लग रही हो!" कहते हुए शैलेंद्र ने मेरे गालों को हल्के से पहली बार छुआ। मैं सिर से पैर तक मीठी सी सिहरन से भर उठी। लगा वक्त यही थम जाए! तेज हवाएँ चलने लगे, बादल गरजने लगे और मैं लरजकर शैलेंद्र के चौड़े सीने में सिमट जाऊं। "मेरी हीरोइन! अब तो जल्दी ही ब्याह कर ले जाऊँगा तुझे! सब देखते रह जाएँगे! देख लेना!"
अभी शैलेंद्र की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि मौसम ने जबरदस्त करवट ली और बादल सचमुच गरजने लगे। देखते ही देखते मोटी मोटी बारिश की बूँदें बरसने लगी। शैलेंद्र ने मुझे तेजी से खींचकर गाड़ी में बिठाया। इतनी देर में ही तेज गड़गड़ाहट के साथ बिजली चमकी और झमाझम बारिश शुरु हो गयी। "शैलेंद्र! अच्छा हुआ तुम आ गए वरना पता नहीं मेरा क्या होता!" "ये तो मैंने मुन्नी से पूछा कि गीता शादी में नहीं दिख रही तो उसने बताया कि तुम ब्यूटी पार्लर गई हो तैयार होने। उसी समय शर्मा अंकल से गाड़ी की चाबी ली और तुम्हें लेने आ गया परंतु अचानक ये तुम्हें पार्लर जाने की क्या सूझी?" "तुम्हारे लिये ही तो!" "सच!" मुस्कराते हुए शैलेंद्र ने मेरी ओर देखा ही था कि अचानक गाड़ी एक गड्ढे में जा फँसी। "ओह अंधेरे में मुझे गड्ढा दिखा ही नहीं।" "अब?" "आस पास भी कोई नहीं जो मदद कर सके। मैं खुद ही बाहर जाता हूँ। "शैलेंद्र तुम भीग जाओगे।" "पर और चारा ही क्या है? तुम चिंता न करो।" शैलेंद्र ने मुझे दिलासा दिया। अब मुझे खुद पर ही क्रोध आ रहा था। अपनी बेवकूफ़ी पर, अपने बचपने पर, अपनी नादानी पर! शैलेंद्र नये-नकोर नीले कुर्ते में बाहर तेज बारिश में भीग रहा था और मैं अंदर बैठी मन ही मन अपनी बेवकूफ़ी पर कुढ़ रही थी। रात गहराती जा रही थी, बारिश बढ़ती जा रही थी। अब सिर्फ जोर जोर से डाँटती हुई माँ, क्रोधित पापा ही सामने दिख रहे थे बस। मेरा सारा रोमांस उड़ चुका था! और अब मैं फूलों को सहलाते हुए गुनगुना रही थी। जिन्दगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात।
अन्जू खरबंदा, दिल्ली।
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