जनक कुमारी की बगिया को सींचकर जंगबहादुर सिंह ने पुनः बनाया शिक्षा का मंदिर
जनक कुमारी इण्टर कालेज के प्रिंसपल बने "बागबान"
स्कूल की भव्यता देखकर सभी पुरातन छात्रों की जुबां से निकलता है वंडरफूल
12 वर्षो में 17 कमरे, दो बड़े हाल और भव्य गेट का कराया निर्माण
जंगबहादुर सिंह ने महामना मदन मोहन मालवीय जी को बनाया अपना आर्दश, तभी हुए सफल
जौनपुर। आपसे मिलती शिक्षा ऐसी, जो जीवन को संवारती हैै। संघर्षो की राह बताकर आगे बढ़ना सिखलाते, शिक्षक तुम हो महान जीवन में रोशनी लाते हो। यह लाइने जनक कुमारी इण्टर कालेज हुसेनाबाद के पिं्रसपल जंगबहादुर सिंह पर सटीक बैठ रही है। जंगबहादुर सिंह जहां एक कुशल शिक्षक है वही विद्यालय परिवार के लिए आंखों के नूर भी है। उक्त बाते प्रिंसपल के लिए हम इस लिए कह रहे है कि उन्होने अपने 12 वर्षो के कार्यकाल में जहां स्कूल में पठन-पाठन की गुणवक्ता को सुधारा वही विद्यालय भवन को भब्य और सुन्दर बनाकर जिले का सबसें खूबसूरत शिक्षा का मंदिर स्थापित किया। इस विद्यालय के कोई पुरातन छात्र जब इस परिसर में आते है तो स्कूल का भवन देखते ही उनके मुंह से बस एक ही अल्फाज निकलता है वंडरफूल ।
नगर के हुसेनबाद मोहल्ले में सन् 1953 में जिले के प्रख्यात चिकित्सक डा0 कमलाकांत वर्मा की पत्नी जनक कुमारी वर्मा ने बाल शिक्षा निकेतन के नाम से स्कूल की स्थापना की थी। उस दौर में जिला का यह पहला कांवेंट स्कूल था। शुरूआती दौर से पढ़ाई लिखाई अच्छी होने के कारण जिले के आला अफसरों,डाक्टर्स और बड़े व्यापारियों के बच्चें इसी स्कूल में पढ़ते थे। इस स्कूल का संचालन खुद जनक कुमारी ही करती थी। उनके दिवंगत होने के बाद इस स्कूल का नाम के आगे जनक कुमारी बाल शिक्षा निकेतन कर दिया गया। इण्टर की मान्यता मिलने के पश्चात इस विद्यालय का नाम जनक कुमारी इण्टर कालेज हो गया। प्रिंसपल रेहाना बेगम के कार्यकाल तक पढ़ाई की गुणवक्ता और अनुशासन चुस्त दुरूस्त रहा । उसके बाद धीरे-धीरे पढ़ाई लिखाई का स्तर कम होने लगा क्लास रूम जरजर हो गये जिसके कारण अच्छे परिवारों के बच्चों का मोहभंग होता चला गया।
जंगबहादुर सिंह ने पढ़ाई लिखाई, सफाई और अनुशासन समेत चहुमुखी विकास पर विशेष ध्यान दिया जिसके कारण यह स्कूल जिले में टॉप हो गया है।
जंगबहादुर सिंह शिराज ए हिन्द डॉट कॉम से खास बातचीत में बताया कि जब मैं इस स्कूल की कमान सम्भाला था उस समय यहां की स्थित बहुत खराब थी। मेरा आफिस एक छोटे से कमरे में था सभी क्लास रूम की हालत दयनीय थी, छात्रों की संख्या काफी कम था। इस लिए मैने पहले प्रबंधक संतोष श्रीवास्तव एडवोकेट से वार्ता करके पूरी योजना बनाया उसके बाद मै अपने रणनीति पर कार्य करना शुरू किया। विद्यालय को सजाने सवारने के लिए मैने अपने घर का सभी कार्य छोड़कर पूरा ध्यान इस पर लगाया।
उन्होने बताया कि स्कूल खुलने व बंद होने से आधे घंटे पहले आता हूं और बंद होने के आधे घंटे बाद घर जाता हूं। शाम को पुनः स्कूल पहुंचकर पूरी निगरानी करने के बाद ही चैन की नींद सो पाता हूं।




