टेट अनिवार्यता का आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ : प्रमोद तिवारी
प्रतिनिधिमंडल ने विगत शीतकालीन सत्र में शिक्षकों के पक्ष में जोरदार आवाज उठाने के लिए देश-प्रदेश के लाखों शिक्षकों की ओर से सांसद प्रमोद तिवारी का आभार व्यक्त किया। साथ ही शिक्षकों के अस्तित्व और सेवा सुरक्षा को लेकर उनके दीर्घ राजनीतिक एवं विधिक अनुभव से मार्गदर्शन प्राप्त करते हुए आगामी बजट सत्र में आरटीई एक्ट में संशोधन हेतु विधायी उपायों पर विस्तृत चर्चा की और इस संबंध में ज्ञापन सौंपा।
इस अवसर पर राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी ने स्पष्ट कहा कि टेट अनिवार्यता का आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है। उन्होंने कहा कि कोई भी कानून अपने निर्माण की तिथि से लागू होता है, न कि पूर्व प्रभाव से। पहले से नियुक्त शिक्षकों पर नई पात्रता शर्तें थोपना न केवल अन्यायपूर्ण बल्कि अव्यवहारिक भी है।
उन्होंने कहा कि जिन शिक्षकों की भर्ती तत्कालीन विज्ञापनों एवं पात्रताओं के आधार पर हुई है और जो 20–25 वर्षों से सेवा दे रहे हैं, उनसे आज की चयन प्रक्रिया या पात्रता परीक्षा को दोबारा पास करने की अपेक्षा करना पूरी तरह गलत है। यदि ऐसा तर्क स्वीकार किया जाए तो क्या सिविल सेवा, स्वास्थ्य सेवा, न्यायिक सेवा अथवा अन्य किसी विभाग में पहले से चयनित कर्मचारियों को भी नई सेवा शर्तों के अनुसार पुनः परीक्षा देने के लिए बाध्य किया जाएगा?
प्रमोद तिवारी ने आश्वस्त किया कि शिक्षकों को न्याय दिलाने के लिए वे पूरी गंभीरता से प्रयासरत हैं और आगामी बजट सत्र में इस विषय पर विधायी विकल्पों को लेकर सदन के जिम्मेदार सदस्यों के साथ सार्थक पहल करेंगे। उन्होंने कहा कि जब तक कानून में आवश्यक संशोधन नहीं होता और शिक्षकों की सेवा सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती, तब तक वे शिक्षकों के साथ मजबूती से खड़े रहेंगे।
इस अवसर पर जिला उपाध्यक्ष राजेश सिंह टोनी, जिला उपाध्यक्ष संतोष सिंह बघेल, जिला अध्यक्ष प्रयागराज अखिलेश द्विवेदी, वरिष्ठ उपाध्यक्ष मनोज तिवारी एवं संगठन मंत्री सतीश तिवारी उपस्थित रहे।

