पति के बाद अब भाई को भी दी मुखाग्नि, जौनपुर की महिला ने पेश की साहस और रिश्तों की मिसाल
जौनपुर। समाज में जहां पारंपरिक मान्यताएं अक्सर महिलाओं की भूमिका को सीमित करती रही हैं, वहीं जौनपुर की एक महिला ने साहस, कर्तव्य और रिश्तों की गहराई का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया है, जो लंबे समय तक याद किया जाएगा।
नगर रसमंडल मच्छरहट्टा निवासी सुश्री अंजू पाठक ने एक बार फिर सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ते हुए अपने सगे भाई संजय कांत तिवारी के निधन पर उन्हें मुखाग्नि देकर भाई-बहन के रिश्ते को नई परिभाषा दी। इससे पहले, लगभग 13 वर्ष पूर्व अपने पति रज्जन पाठक की मौत होने के बाद उन्होंने नगर के रामघाट पर स्वयं उनका अंतिम संस्कार कर समाज में एक अलग मिसाल कायम की थी।
उनके भाई संजय कांत तिवारी का आकस्मिक निधन हो गया। वे 56 वर्ष के थे और काशी विद्यापीठ, वाराणसी से शिक्षित थे। अविवाहित संजय कांत तिवारी ने अपने जीवन को परिवार के लिए समर्पित कर दिया था। वर्ष 2013 में बहन अंजू पाठक के पति के निधन के बाद उन्होंने पूरे परिवार की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाई और निष्ठा के साथ उसका निर्वहन किया।
उन्होंने अपने भांजे के साथ मिलकर पारिवारिक व्यवसाय को न केवल संभाला, बल्कि उसे आगे बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके व्यक्तित्व में सादगी, संवेदनशीलता और कर्तव्यनिष्ठा साफ झलकती थी।
भाई के निधन के बाद जब परिवार में कोई अन्य पुरुष सदस्य मौजूद नहीं था, तब अंजू पाठक ने एक बार फिर साहस दिखाते हुए सभी धार्मिक विधि-विधान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया। रामघाट पर उन्होंने स्वयं अपने भाई को मुखाग्नि दी। यह दृश्य वहां मौजूद लोगों के लिए भावुक कर देने वाला था और हर किसी की आंखें नम हो गईं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि अंजू पाठक ने जिस हिम्मत और दृढ़ता के साथ दोनों बार अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभाई, वह समाज के लिए प्रेरणादायक है। उन्होंने यह साबित कर दिया कि रिश्तों की सच्चाई और कर्तव्य किसी लिंग की मोहताज नहीं होती।
अंजू पाठक का यह कदम न केवल पारिवारिक जिम्मेदारी का उदाहरण है, बल्कि यह समाज में महिलाओं की बदलती भूमिका और उनके सशक्तिकरण का भी प्रतीक बन गया है।
ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें तथा शोक संतप्त परिवार को इस अपूरणीय क्षति को सहन करने की शक्ति दें।

