14 साल में बदली जनक कुमारी इंटर कॉलेज की तस्वीर, प्रिंसिपल डॉ. जंगबहादुर सिंह ने बहाई विकास की गंगा
जर्जर कमरों से भव्य भवन तक का सफर, पढ़ाई-लिखाई से लेकर अनुशासन तक में कायम की मिसाल — राज्य पुरस्कार से भी नवाजे जा चुके हैं डॉ. जंगबहादुर सिंह
जौनपुर। जनक कुमारी इंटर कॉलेज, हुसेनाबाद के प्रधानाचार्य डॉ. जंगबहादुर सिंह को विद्यालय की कमान संभाले आज पूरे 14 वर्ष हो गए। 27 अगस्त 2012 को जब उन्होंने प्रधानाचार्य के रूप में विद्यालय की जिम्मेदारी संभाली थी, उस समय कॉलेज की स्थिति बेहद खराब थी। जर्जर क्लास रूम, सीमित संसाधन, कम छात्र संख्या और छोटा-सा कार्यालय उनकी राह में बड़ी चुनौतियां थीं। लेकिन डॉ. सिंह ने इन चुनौतियों को बाधा नहीं, बल्कि बदलाव का अवसर माना। नतीजा यह हुआ कि 14 वर्षों में उन्होंने विद्यालय की तस्वीर और तकदीर दोनों बदल दी। आज कभी बदहाल नजर आने वाला यह शिक्षण संस्थान भव्य भवन, बेहतर शैक्षणिक माहौल, अनुशासन, स्वच्छता और आधुनिक सुविधाओं के लिए अपनी अलग पहचान बना चुका है।डॉ. जंगबहादुर सिंह की पहचान केवल एक प्रधानाचार्य के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे शिक्षक के रूप में बनी है, जिसने विद्यालय को अपना परिवार और उसके विकास को अपना मिशन मान लिया। यही वजह है कि विद्यालय परिवार में उन्हें 'आंखों का नूर' कहा जाता है। उनकी कर्मठता और लगन का असर कॉलेज की हर गतिविधि में दिखाई देता है।
जर्जर कमरों से भव्य शिक्षण मंदिर तक का सफर
नगर के हुसेनाबाद मोहल्ले में वर्ष 1953 में जिले के प्रख्यात चिकित्सक डॉ. कमलाकांत वर्मा की पत्नी जनक कुमारी वर्मा ने बाल शिक्षा निकेतन के नाम से इस विद्यालय की नींव रखी थी। उस दौर में यह जिले का पहला कॉन्वेंट स्कूल माना जाता था। पढ़ाई की गुणवत्ता और अनुशासन के कारण शुरुआती दौर से ही जिले के आला अधिकारियों, चिकित्सकों और बड़े व्यापारियों के बच्चे यहां शिक्षा ग्रहण करते थे। विद्यालय का संचालन स्वयं जनक कुमारी वर्मा करती थीं।
उनके निधन के बाद विद्यालय के नाम में 'जनक कुमारी' जोड़ा गया। इंटर की मान्यता मिलने के बाद यह विद्यालय जनक कुमारी इंटर कॉलेज के नाम से जाना जाने लगा। प्रधानाचार्य रेहाना बेगम के कार्यकाल तक पढ़ाई और अनुशासन की मजबूत परंपरा कायम रही, लेकिन बाद के वर्षों में विद्यालय का शैक्षणिक स्तर और भौतिक संसाधन धीरे-धीरे कमजोर होते चले गए। जर्जर कक्षाओं और घटती छात्र संख्या के कारण अच्छे परिवारों के बच्चों का विद्यालय से मोहभंग होने लगा।

27 अगस्त 2012 को शुरू हुआ कायाकल्प का अध्याय
ऐसे दौर में 27 अगस्त 2012 को डॉ. जंगबहादुर सिंह ने प्रधानाचार्य के रूप में विद्यालय की कमान संभाली। उन्होंने पहले ही दिन तय कर लिया कि विद्यालय को पुराने गौरव की ओर लौटाना है। इसके लिए उन्होंने विद्यालय के प्रबंधक संतोष श्रीवास्तव एडवोकेट से विचार-विमर्श कर विस्तृत कार्ययोजना तैयार की।
महामना मदनमोहन मालवीय के जीवन और शिक्षा के प्रति उनके समर्पण से प्रेरणा लेते हुए डॉ. सिंह ने विद्यालय के सक्षम पुरातन छात्रों, जनप्रतिनिधियों और शुभचिंतकों से संपर्क शुरू किया। उन्होंने सहयोग मांगा तो लोगों ने भी दिल खोलकर साथ दिया। इसी सामूहिक प्रयास ने देखते ही देखते विद्यालय के कायाकल्प की नींव रख दी।
वर्ष 2014 से शुरू हुआ निर्माण और विकास का सिलसिला आज भी जारी है। इस अवधि में विद्यालय परिसर में 18 नए क्लास रूम, दो बड़े हाल, भव्य मुख्य द्वार और साइंस लैब समेत कई महत्वपूर्ण निर्माण कार्य कराए गए। कभी जिन कमरों की हालत देखकर छात्र- अभिभावक चिंतित होते थे, आज वही परिसर आकर्षण का केंद्र बन चुका है।
पुरातन छात्रों के मुंह से निकलता है—'वंडरफुल'
विद्यालय के कायाकल्प की सबसे बड़ी गवाही उसके पुरातन छात्र देते हैं। वर्षों बाद जब पुराने विद्यार्थी अपने विद्यालय परिसर में पहुंचते हैं और भव्य भवन, साफ-सफाई तथा बदला हुआ वातावरण देखते हैं तो उनके चेहरे पर खुशी साफ झलकती है। कई पुरातन छात्रों के मुंह से विद्यालय की नई तस्वीर देखकर अनायास ही निकल पड़ता है—"वंडरफुल!"
यह बदलाव महज भवन निर्माण तक सीमित नहीं रहा। डॉ. सिंह ने पढ़ाई-लिखाई, अनुशासन, स्वच्छता, विद्यार्थियों की गतिविधियों और विद्यालय के समग्र विकास पर समान रूप से ध्यान दिया। यही कारण है कि विद्यालय ने शैक्षणिक और अन्य क्षेत्रों में लगातार बेहतर प्रदर्शन किया और जिले के प्रमुख शिक्षण संस्थानों में अपनी मजबूत पहचान बनाई।
'विद्यालय बंद होने के बाद भी मेरा काम खत्म नहीं होता'
डॉ. जंगबहादुर सिंह कहते हैं कि प्रधानाचार्य का पद उनके लिए केवल नौकरी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और साधना है। उन्होंने शिराज-ए-हिन्द डॉट कॉम से विशेष बातचीत में बताया कि जब उन्होंने विद्यालय की कमान संभाली थी, तब हालात बेहद खराब थे। उनका कार्यालय भी एक छोटे से कमरे में था और लगभग सभी कक्षाओं की हालत दयनीय थी। छात्र संख्या भी काफी कम थी।
उन्होंने बताया कि प्रबंधक संतोष श्रीवास्तव एडवोकेट से बातचीत के बाद विद्यालय के विकास की पूरी योजना तैयार की गई और फिर उसे धरातल पर उतारने का काम शुरू हुआ। विद्यालय को सजाने-संवारने और बेहतर बनाने के लिए उन्होंने अपने निजी जीवन के कई कामों को पीछे छोड़कर पूरा ध्यान कॉलेज पर केंद्रित कर दिया।
उनकी दिनचर्या भी उनकी कर्मठता की कहानी बयां करती है। डॉ. सिंह के अनुसार, विद्यालय खुलने के आधे घंटे पहले वह पहुंच जाते हैं और छुट्टी के आधे घंटे बाद घर लौटते हैं। इसके बाद भी शाम को दोबारा विद्यालय पहुंचकर व्यवस्थाओं और सुरक्षा समेत अन्य गतिविधियों की निगरानी करते हैं। पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद ही घर जाकर चैन की नींद लेते हैं।
मेहनत को मिला राज्य पुरस्कार का सम्मान
डॉ. जंगबहादुर सिंह की वर्षों की मेहनत और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान को उस समय बड़ी पहचान मिली, जब दिसंबर 2024 में उन्हें राज्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया। पुरस्कार की खबर सामने आते ही शिक्षा जगत समेत जिले के विभिन्न क्षेत्रों में खुशी की लहर दौड़ गई। बड़ी संख्या में लोगों ने सोशल मीडिया, विद्यालय और उनके घर पहुंचकर उन्हें बधाई दी।
माध्यमिक शिक्षक संघ के संरक्षक रमेश सिंह ने इसे जौनपुर के लिए गौरव का विषय बताते हुए कहा कि डॉ. जंगबहादुर सिंह इस सम्मान के सबसे योग्य लोगों में शामिल हैं। उनके नेतृत्व और मेहनत के कारण विद्यालय के विद्यार्थियों ने विभिन्न क्षेत्रों में शानदार प्रदर्शन करते हुए राष्ट्रीय स्तर तक विद्यालय का नाम रोशन किया है।
राज्य पुरस्कार मिलने के बाद डॉ. सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, माध्यमिक शिक्षा मंत्री और शिक्षा विभाग के अधिकारियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
प्रधानाचार्य परिषद के जिलाध्यक्ष की भी जिम्मेदारी
डॉ. जंगबहादुर सिंह की कर्मनिष्ठा और शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका को देखते हुए उन्हें उत्तर प्रदेश प्रधानाचार्य परिषद के जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी भी मिली है। विद्यालय की जिम्मेदारी के साथ-साथ वह प्रधानाचार्यों और शिक्षा जगत से जुड़े मुद्दों को लेकर भी अपनी भूमिका निभा रहे हैं।
एक प्रधानाचार्य ने बदल दी विद्यालय की तस्वीर
14 वर्ष का यह सफर सिर्फ ईंट, सीमेंट और भवन निर्माण की कहानी नहीं है। यह उस सोच की कहानी है, जिसमें एक प्रधानाचार्य ने विद्यालय की बदहाल स्थिति देखकर हार मानने के बजाय बदलाव का संकल्प लिया। जर्जर क्लास रूम से 18 नए कक्षों तक, छोटे कार्यालय से बेहतर सुविधाओं वाले परिसर तक और घटती छात्र संख्या से मजबूत शैक्षणिक पहचान तक का सफर डॉ. जंगबहादुर सिंह की कर्मठता की कहानी कहता है।
आज जनक कुमारी इंटर कॉलेज, हुसेनाबाद का भव्य परिसर उन 14 वर्षों की मेहनत का आईना है। विद्यालय की दीवारें सिर्फ निर्माण की कहानी नहीं कहतीं, बल्कि यह बताती हैं कि जब नेतृत्व में विजन, मेहनत में ईमानदारी और लक्ष्य में शिक्षा का उत्थान हो तो एक बदहाल संस्थान को भी जिले का गौरव बनाया जा सकता है।


