अय्यामे अज़ा के आखिरी दिनों में गूंजा या हुसैन का सद़ा, अलविदाई मजलिस में नम हुईं अज़ादारों की आंखें
जौनपुर। अय्यामे अज़ा के आखिरी दिनों में मजलिसों और जुलूसों का सिलसिला जारी है। इसी क्रम में मोहल्ला अजमेरी स्थित स्वर्गीय सैय्यद अली शब्बर (सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी) के आवास पर कर्बला के शहीदों की याद में अलविदाई मजलिस का आयोजन किया गया। मजलिस में बड़ी संख्या में अज़ादारों ने शिरकत कर शोहदाए कर्बला को याद किया और अलम की ज़ियारत की। कर्बला के शहीदों की कुर्बानियों और मसाएब का जिक्र होते ही माहौल गमगीन हो उठा और अकीदतमंदों की आंखें नम हो गईं।
मजलिस की शुरुआत सोज़ख्वानी से हुई। आमिर मेहंदी कजगांवी ने सोज़ख्वानी की, जबकि मेहंदी जैदी और कैफी मोहम्मदाबादी ने पेशख्वानी की।
मजलिस को संबोधित करते हुए मौलाना सैयद मोहम्मद शाज़ान जैदी ने कहा कि मुहर्रम का चांद नजर आने के बाद से शिया समुदाय दो महीने आठ दिन तक गम मनाता है। अब अय्यामे अज़ा के महज तीन दिन शेष रह गए हैं। उन्होंने अज़ादारों से आह्वान किया कि आखिरी दिनों में भी दिल खोलकर शोहदाए कर्बला का गम मनाएं और बीबी फातिमा को पुरसा पेश करें।
उन्होंने कहा कि अल्लाह तआला ने उम्मत के लिए दो बड़ी नेमतें दी हैं—कुरआन और अहलेबैत। दोनों इंसान को सीधी राह दिखाने का सबसे बड़ा जरिया हैं। उन्होंने हदीस का हवाला देते हुए कहा कि पैगम्बर-ए-इस्लाम ने अपनी उम्मत के बीच कुरआन और अहलेबैत को छोड़ने की बात कही थी और इन दोनों से जुड़े रहने वाले के गुमराह न होने का संदेश दिया था।
मौलाना ने कहा कि कुरआन हिदायत की किताब है, जबकि अहलेबैत उसकी सही तफसीर और अमली नमूना हैं। जिस घर में कुरआन की तिलावत होती है और अहलेबैत की मोहब्बत बसती है, वहां हिदायत का उजाला कायम रहता है।
उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि अहलेबैत ने अपने चाहने वालों को कभी शर्मिंदा नहीं किया। जिसने उनकी सीरत और शिक्षाओं को अपनाया, उसे दुनिया और आखिरत दोनों में कामयाबी मिली। उन्होंने कहा कि अहलेबैत का मुकाबला किसी से नहीं किया जा सकता, क्योंकि उनकी परवरिश स्वयं पैगम्बर-ए-इस्लाम ने की थी।
मजलिस के दौरान मौलाना ने शोहदाए कर्बला की कुर्बानियों और उन पर हुए मसाएब बयान किए। मसाएब सुनकर मजलिस में मौजूद अकीदतमंदों की आंखें नम हो गईं और माहौल गमगीन हो उठा। इसके बाद शबीहे अलम निकाला गया।
अंजुमन गुलशने इस्लाम बाजार भुआ ने नौहाख्वानी और मातम किया। अंत में क़मर जौनपुरी का लिखा अलविदाई नौहा अंजुमन ने गमगीन आवाज में पेश किया, जिसे सुनकर अज़ादार भावुक हो उठे।
कार्यक्रम के अंत में हुसैन मुस्तफा वजीह ने मजलिस में शामिल होने वाले सभी लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया।
इस अवसर पर सैयद मोहम्मद मुस्तफा, मुफ्ती अनवार हैदर, कायम आबदी, सैयद इमदाद मेहंदी, मुफ्ती नजमुल हसन काजमी, हाजी ताहिर खान, मुफ्ती शारिब मेहंदी, जीशान काजमी, असद हैदर, अमीरुल हसन, राजू शारिब, आबिद रजा, जावेद समेत बड़ी संख्या में अकीदतमंद मौजूद रहे।

