एआरटीओ विभाग का एक और काला सच: छह साल से बिना फिटनेस दौड़ती रही स्कूल वैन,फिटनेस खत्म, फिर भी बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़
जौनपुर। स्कूली बच्चों की सुरक्षा को लेकर जिम्मेदार विभागों की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मुंगराबादशाहपुर थाना क्षेत्र के धरमपुर में स्कूली बच्चों को लेकर जा रही वैन और बस की टक्कर के बाद परिवहन विभाग की निगरानी व्यवस्था का एक और चौंकाने वाला सच सामने आया है। जिस वैन से मासूम बच्चों को ढोया जा रहा था, उसका फिटनेस प्रमाण-पत्र कोई कुछ दिन या कुछ महीने पहले नहीं, बल्कि 1 जनवरी 2020 को ही समाप्त हो चुका था। इसके बावजूद यह वाहन करीब छह साल से अधिक समय तक सड़कों पर दौड़ता रहा और स्कूली बच्चों को ढोता रहा।
हादसे के बाद हुई जांच में सामने आए इस तथ्य ने एआरटीओ विभाग की चेकिंग और प्रवर्तन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि जिस वाहन का फिटनेस प्रमाण-पत्र वर्षों पहले खत्म हो गया था, वह लगातार सड़कों पर कैसे चलता रहा? वह भी तब, जब उसमें रोजाना स्कूली बच्चों की जिंदगी दांव पर लगाई जा रही थी। यदि विभागीय स्तर पर नियमित चेकिंग और प्रभावी प्रवर्तन कार्रवाई होती, तो संभवतः यह वाहन लंबे समय तक नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए सड़कों पर नहीं दौड़ पाता।
फिटनेस खत्म, फिर भी बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़
दुर्घटनाग्रस्त टाटा वेंचर वैन संख्या UP50AJ9424 का फिटनेस प्रमाण-पत्र 1 जनवरी 2020 को समाप्त हो चुका था। इसके बाद भी वाहन का इस्तेमाल स्कूली बच्चों को लाने-ले जाने में होता रहा। जांच में यह भी सामने आया कि वाहन आवश्यक परमिट के बगैर संचालित हो रहा था। यानी वाहन की सड़क पर वैधता और सुरक्षा मानकों की बुनियादी शर्तें पूरी नहीं थीं, फिर भी वह बच्चों को लेकर दौड़ता रहा।
यह स्थिति केवल वाहन स्वामी की लापरवाही तक सीमित नहीं है। इसने उस पूरी सरकारी निगरानी व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है, जिसका काम सड़कों पर नियमों का पालन सुनिश्चित करना और असुरक्षित वाहनों को रोकना है।
हादसा सुबह आठ बजे, रिपोर्ट पहुंची 12:45 बजे
मामले में विभागीय कार्यप्रणाली का एक और गंभीर पहलू सामने आया। दुर्घटना सुबह करीब 8 बजे हुई, लेकिन संबंधित अधिकारी द्वारा मुख्यालय को दुर्घटना की प्राथमिक आख्या अथवा सूचना दोपहर 12:45 बजे तक नहीं भेजी गई। यानी घटना के बाद करीब पांच घंटे तक सूचना भेजने में देरी हुई।
परिवहन आयुक्त ने इस देरी को भी गंभीरता से लिया। उनका मानना है कि हादसे जैसी गंभीर घटना में तत्काल सूचना और त्वरित कार्रवाई बेहद जरूरी होती है। ऐसे में सूचना भेजने में हुई देरी ने अधिकारी की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए।
कारण बताओ नोटिस भी बेअसर, जवाब मिला असंतोषजनक
मामले में परिवहन विभाग ने 20 अगस्त 2026 को जौनपुर के यात्री/मालकर अधिकारी (PTO) प्रमोद कुमार को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। अधिकारी ने 21 अगस्त 2026 को अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया, लेकिन विभाग ने उनके जवाब को संतोषजनक नहीं माना।
परिवहन आयुक्त आशुतोष निरंजन ने कार्य के प्रति लापरवाही, शिथिलता और पदीय दायित्वों के प्रति उदासीनता को गंभीर मानते हुए प्रमोद कुमार को ‘विशेष प्रतिकूल प्रविष्टि’ प्रदान की है।
सवाल सिर्फ एक वैन का नहीं, पूरे सिस्टम का है
इस कार्रवाई के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि एक स्कूली वाहन का फिटनेस प्रमाण-पत्र छह साल से अधिक समय से समाप्त था, तो विभागीय चेकिंग में यह वाहन इतने लंबे समय तक कैसे बचता रहा? क्या जिले में स्कूली वाहनों की नियमित जांच महज कागजों तक सीमित है? क्या सड़क पर दौड़ रहे वाहनों की वास्तविक स्थिति की निगरानी हो रही है या फिर कार्रवाई केवल हादसा होने के बाद ही शुरू होती है?
स्कूली वाहनों के मामले में लापरवाही की कीमत सीधे बच्चों की जान से जुड़ी होती है। ऐसे में फिटनेस, परमिट, चालक की योग्यता और वाहन की तकनीकी स्थिति की नियमित जांच केवल विभागीय औपचारिकता नहीं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा की पहली जिम्मेदारी है।
आयुक्त की कार्रवाई ने खोली विभागीय निगरानी की पोल
परिवहन आयुक्त की कार्रवाई ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इस मामले में केवल दुर्घटनाग्रस्त वाहन ही सवालों के घेरे में नहीं है, बल्कि उस वाहन को वर्षों तक सड़कों पर चलने देने वाली निगरानी व्यवस्था भी कटघरे में है। विभाग ने माना है कि यदि नियमों का उल्लंघन कर बिना वैध फिटनेस संचालित हो रहे स्कूली वाहनों के खिलाफ समय रहते प्रभावी चेकिंग और प्रवर्तन कार्रवाई की गई होती, तो ऐसी दुखद दुर्घटना को टाला जा सकता था।
यह कार्रवाई एक अधिकारी को दंडित करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। अब जरूरत इस बात की है कि जिले में संचालित सभी स्कूली वाहनों की जमीनी स्तर पर व्यापक जांच कराई जाए और वर्षों से बिना फिटनेस, परमिट अथवा अन्य अनिवार्य दस्तावेजों के संचालित वाहनों की सूची सामने लाई जाए। तभी बच्चों की सुरक्षा से जुड़े इस गंभीर सवाल का स्थायी समाधान निकल सकेगा।
हादसे के बाद हुई कार्रवाई ने एआरटीओ विभाग के सामने एक बड़ा आईना रख दिया है—जब फिटनेस छह साल पहले खत्म हो गई थी, तो जिम्मेदारों की नजर इस वाहन पर आखिर कब पड़ती?

