पूर्व चेयरमैन शीला श्रीवास्तव पंचतत्व में विलीन, अंतिम विदाई में उमड़ा पूर्वांचल, राजघाट तक उमड़ा जनसैलाब
दो बार संभाली थी नगर पालिका परिषद की कमान, जनसेवा और सरल व्यक्तित्व की अमिट छाप छोड़ गईं शीला श्रीवास्तव
आजमगढ़। नगर की राजनीति, सामाजिक जीवन और जनसेवा की पहचान बन चुकीं आजमगढ़ नगर पालिका परिषद की पूर्व अध्यक्ष श्रीमती शीला श्रीवास्तव मंगलवार को पंचतत्व में विलीन हो गईं। उनकी अंतिम यात्रा जनसैलाब में बदल गई। पैतृक आवास कुर्मी टोला से लेकर राजघाट श्मशान घाट तक हजारों लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। आजमगढ़ ही नहीं, बल्कि वाराणसी, जौनपुर समेत पूर्वांचल के कई जनपदों से जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता, व्यापारी, अधिवक्ता और आम नागरिक उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचे।सुबह से ही उनके आवास पर श्रद्धांजलि अर्पित करने वालों का तांता लगा रहा। नम आंखों और भारी मन से लोगों ने अपनी प्रिय जननेत्री को अंतिम प्रणाम किया। अंतिम यात्रा के दौरान पूरे वातावरण में गम और श्रद्धा का अद्भुत संगम देखने को मिला।
श्रीमती शीला श्रीवास्तव लंबे समय से किडनी सहित कई गंभीर बीमारियों से जूझ रही थीं। उनका इलाज लखनऊ के एक निजी अस्पताल में चल रहा था, जहां मंगलवार सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन का समाचार मिलते ही पूरे शहर में शोक की लहर दौड़ गई और हर वर्ग के लोगों ने इसे नगर की अपूरणीय क्षति बताया।
शीला श्रीवास्तव नगर पालिका परिषद के पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय गिरीश चंद्र श्रीवास्तव की धर्मपत्नी थीं। पति के सामाजिक और राजनीतिक आदर्शों को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने स्वयं भी नगर पालिका परिषद की दो बार अध्यक्ष के रूप में सफल नेतृत्व किया। अपने कार्यकाल में उन्होंने नगर के विकास, स्वच्छता, बुनियादी सुविधाओं और जनहित के कार्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। यही वजह रही कि वह जनता के बीच एक लोकप्रिय और भरोसेमंद जनप्रतिनिधि के रूप में स्थापित हुईं।
उनकी सबसे बड़ी पहचान केवल राजनीति नहीं, बल्कि उनका सरल, सौम्य और आत्मीय व्यक्तित्व था। किसी भी व्यक्ति से बिना भेदभाव के मिलना, उसकी समस्या सुनना और समाधान के लिए हरसंभव प्रयास करना उनके स्वभाव का हिस्सा था। यही कारण है कि उनके निधन पर हर वर्ग के लोगों की आंखें नम दिखाई दीं।
अंतिम संस्कार के दौरान सामाजिक, राजनीतिक, प्रशासनिक और व्यापारिक जगत की अनेक हस्तियों ने उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए। सभी ने एक स्वर में कहा कि शीला श्रीवास्तव का जीवन जनसेवा, सादगी और समर्पण का पर्याय था। उनके निधन से आजमगढ़ ने ऐसी जनसेविका को खो दिया है, जिनकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी।
श्रद्धांजलि सभा में उपस्थित लोगों ने दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हुए ईश्वर से शोकाकुल परिवार को इस असहनीय दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करने की कामना की। नगर की गलियों से लेकर राजनीतिक गलियारों तक हर ओर सिर्फ एक ही चर्चा रही—"शीला जी नहीं रहीं, लेकिन उनकी सेवा, सादगी और जनहित के लिए किए गए कार्य हमेशा लोगों के दिलों में जीवित रहेंगे।"

