अंग्रेजों की तोपें भी नहीं तोड़ सकीं बागी संग्राम सिंह का हौसला, आज भी जिंदा है वीरता की गूंज
जिसे अंग्रेजों ने ‘बागी’ कहा, वही आज स्वाभिमान और शौर्य का प्रतीक | नेवढ़िया की धरती से उठी थी अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती, गांव-गांव के रणबांकुरों ने दिया था साथ
जौनपुर। जिस दौर में अंग्रेजी हुकूमत के सामने बोलना भी गुनाह समझा जाता था, उस दौर में जौनपुर की धरती पर एक ऐसा योद्धा खड़ा हुआ, जिसने विदेशी सत्ता के आगे सिर झुकाने से इनकार कर दिया। हाथ में हथियार और दिल में देशभक्ति लिए उसने अंग्रेजों को खुली चुनौती दी। यह कहानी है बागी राजा संग्राम सिंह की, जिनकी वीरता की गूंज आज भी रामनगर विकासखंड के नेवढ़िया और आसपास के गांवों में सुनाई देती है।नेवढ़िया बाजार के उत्तर दिशा में स्थित उत्तर पट्टी ग्राम पंचायत की धरती राजा संग्राम सिंह की जन्मभूमि बताई जाती है। कभी यहां उनका विशाल किला हुआ करता था, जिसे आज भी स्थानीय लोग ‘कोट’ के नाम से जानते हैं। यही वह स्थान था, जहां से अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष की रणनीतियां बनती थीं और आसपास के गांवों के रणबांकुरे उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर विदेशी सत्ता को चुनौती देते थे।
अंग्रेजों के लिए सिरदर्द बन गए थे संग्राम सिंह
अंग्रेजी हुकूमत का अत्याचार जब हद से बढ़ा और जनता कराह उठी तो राजा संग्राम सिंह ने हथियार उठा लिए। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया। अंग्रेजों ने उन्हें ‘बागी’ का नाम दिया, लेकिन जिस नाम से अंग्रेज उन्हें डराना चाहते थे, वही नाम आगे चलकर उनकी वीरता और स्वाभिमान की पहचान बन गया।
अंग्रेजों ने संग्राम सिंह को पकड़ने और उनके किले पर कब्जा करने के लिए तमाम कोशिशें कीं, लेकिन हर बार उन्हें मुंह की खानी पड़ी। संग्राम सिंह अंग्रेजों की पकड़ से बच निकलते और फिर अचानक उनके खिलाफ मोर्चा खोल देते। उनका साहस और रणकौशल अंग्रेजी अफसरों के लिए लगातार चुनौती बना रहा।
गांव-गांव से उठी थी अंग्रेजों के खिलाफ बगावत
संग्राम सिंह की लड़ाई अकेले की लड़ाई नहीं थी। उत्तर पट्टी, नेवढ़िया, हथेरा, भोड़ा तिलंगा, करमौवा, तिवरान, दोदापुर, बनेवरा, तरती और बर्राह समेत आसपास के गांवों के लोगों ने उनका साथ दिया।
कहीं अंग्रेजों की गतिविधियों की खबर पहुंचाई जाती थी, कहीं हमले की रणनीति तैयार होती थी तो कहीं क्रांतिकारियों के छिपने और रहने का इंतजाम। गांवों के रणबांकुरों ने अंग्रेजों के खिलाफ ऐसा मजबूत नेटवर्क तैयार कर दिया था कि संग्राम सिंह तक पहुंचना अंग्रेजों के लिए आसान नहीं था।
जब अंग्रेजों ने किले पर बरसा दीं तोपें
कहा जाता है कि संग्राम सिंह को गिरफ्तार करने में बार-बार नाकाम रहने के बाद अंग्रेजी हुकूमत बौखला उठी। आखिरकार कलकत्ता से पलटन बुलाए जाने की बात कही जाती है और नेवढ़िया स्थित संग्राम सिंह के किले पर तोपों से हमला कर उसे ध्वस्त कर दिया गया।
किला ढह गया, लेकिन बागी का हौसला नहीं टूटा।
ईंट-पत्थरों का किला भले अंग्रेजी तोपों ने गिरा दिया, लेकिन संग्राम सिंह की वीरता की वह कहानी आज भी लोगों के दिलों में खड़ी है। यही वजह है कि नेवढ़िया की मिट्टी आज भी स्वाभिमान, प्रतिरोध और राष्ट्रभक्ति की कहानी सुनाती है।
कलम ने भी दर्ज किया बागी का पराक्रम
राजा संग्राम सिंह की वीरता केवल लोककथाओं तक सीमित नहीं रही। कवि होरी लाल अंशात और श्रीनाथ द्विवेदी ने अपनी पुस्तकों में उनके शौर्य का वर्णन किया है। उनकी वीरगाथाएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों तक पहुंचती रही हैं।
संग्राम सिंह केवल राजशाही के राजा नहीं थे, बल्कि जनता के दुख-दर्द को समझने वाले ऐसे योद्धा के रूप में याद किए जाते हैं, जिन्होंने अंग्रेजी दमन के खिलाफ आवाज उठाई।
उपेक्षा की धूल से फिर निकला वीरता का इतिहास
समय के साथ बागी संग्राम सिंह का ऐतिहासिक स्थल उपेक्षा की चादर में ढक गया। बाद में पूर्वांचल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति हरिमूर्ति सिंह के प्रयास से यहां कीर्ति स्तंभ स्थापित किया गया, जिस पर आसपास के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नाम अंकित किए गए।
कभी यहां प्रतिवर्ष बागी संग्राम सिंह की स्मृति में कवि सम्मेलन और मुशायरे आयोजित होते थे। लेकिन समय बदला और आयोजन बंद हो गए। वीर योद्धा की स्मृतियों का स्थल फिर उपेक्षित होने लगा।
स्थानीय लोगों ने तत्कालीन भाजपा विधायक हरेन्द्र प्रसाद सिंह से ऐतिहासिक स्थल के कायाकल्प की मांग की। विधायक ने मामले को गंभीरता से लिया और स्थल का विकास कराया। इसके बाद एक बार फिर बागी संग्राम सिंह की वीरगाथा लोगों की जुबान पर लौट आई।
किसी एक समाज के नहीं, सर्व समाज के नायक
बागी संग्राम सिंह की सबसे बड़ी पहचान यही है कि उन्हें किसी एक जाति या वर्ग की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। उनकी लड़ाई जनता के स्वाभिमान और विदेशी हुकूमत के खिलाफ थी।
जब अंग्रेजों का अत्याचार बढ़ा तो अलग-अलग गांवों और समाज के लोग उनके साथ खड़े हुए। यही कारण है कि आज भी बागी संग्राम सिंह को सर्व समाज के लोग सम्मान और गर्व के साथ याद करते हैं।
‘बागी’ नाम अंग्रेजों ने दिया, पहचान देश ने दी
अंग्रेजों ने उन्हें बागी कहा क्योंकि उन्होंने गुलामी स्वीकार नहीं की। लेकिन इतिहास ने उसी ‘बागी’ शब्द को सम्मान में बदल दिया।
वह बागी था, क्योंकि उसे गुलामी मंजूर नहीं थी।
वह योद्धा था, क्योंकि उसे अन्याय मंजूर नहीं था।
वह जननायक था, क्योंकि उसने जनता के दर्द को अपना दर्द माना।
नेवढ़िया की धरती आज भी गवाही देती है कि अंग्रेजों की तोपें भले ही संग्राम सिंह का किला ढहा सकीं, लेकिन उस वीर के भीतर जल रही आजादी और स्वाभिमान की लौ को कभी नहीं बुझा सकीं।
बागी संग्राम सिंह केवल इतिहास नहीं हैं—वह उस अदम्य हौसले का नाम हैं, जो सत्ता के सामने नहीं, सत्य और स्वाभिमान के साथ खड़ा होना सिखाता है।

