इंटर के बाद ब्याहता बनीं, चार बच्चों की मां ने फिर पकड़ी किताब; बीए से पीएचडी तक का सफर तय कर बनीं सरकारी स्कूल की पहचान

 पति को कैंसर हुआ तो टूटने के बजाय बच्चों के भविष्य के लिए खुद को संभाला, बेटियों को पढ़ाकर बनाया काबिल; अब चकताली के सरकारी स्कूल को कॉन्वेंट स्कूलों से दिला रहीं टक्कर

शिक्षक दिवस पर विशेष रिपोर्ट 

जौनपुर। “उम्र बीतने का इंतजार मत कीजिए, अगर दिल में कुछ कर गुजरने का जुनून हो तो जिंदगी के किसी भी पड़ाव से नई शुरुआत की जा सकती है।” यह पंक्ति नगर के हुसेनाबाद मोहल्ले की निवासी और बेसिक शिक्षा विभाग में कार्यरत डॉ. उषा सिंह की जिंदगी पर बिल्कुल सटीक बैठती है। कभी सामाजिक बंधनों के चलते इंटरमीडिएट के बाद ही विवाह हो गया। दुल्हन बनकर ससुराल पहुंचीं तो परिवार की जिम्मेदारियां कंधों पर आ गईं। बच्चे हुए, घर-गृहस्थी संभाली और करीब एक दशक तक उनकी दुनिया परिवार तक सिमटी रही। लेकिन बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने की चाह ने उनके भीतर पढ़ाई का बुझा हुआ दीप फिर जला दिया।


फिर शुरू हुआ ऐसा सफर, जिसकी कल्पना शायद उन्होंने खुद भी नहीं की थी। घर-परिवार की जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने दोबारा किताबें उठाईं और एक-एक करके बीए, बीएड, एमए, एमएड और पीएचडी की डिग्रियां हासिल कर डालीं। इतना ही नहीं, उन्होंने अलग-अलग विषयों से चार स्नातकोत्तर डिग्रियां हासिल कीं। डिग्री कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में भी काम किया, लेकिन परिवार के साथ रहकर बच्चों की बेहतर देखभाल करने और स्थायी नौकरी की चाह में वह नौकरी छोड़कर बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षक बन गईं।


आज डॉ. उषा सिंह केवल अपने संघर्ष की कहानी नहीं हैं, बल्कि वह उन महिलाओं के लिए मिसाल हैं, जो परिस्थितियों को अपनी मंजिल की राह में दीवार समझ लेती हैं। उन्होंने न केवल अपने बच्चों का भविष्य संवारा, बल्कि अब सरकारी विद्यालय के बच्चों की जिंदगी संवारने में जुटी हैं।


इंटर के बाद शादी, फिर एक दशक तक घर-परिवार की जिम्मेदारी


डॉ. उषा सिंह बताती हैं कि उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही प्राथमिक विद्यालय में हुई। इसके बाद उन्होंने नेहरू इंटरमीडिएट कॉलेज से पढ़ाई की। वर्ष 1982 में हाईस्कूल प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया। उस दौर में गांव की बेटी का प्रथम श्रेणी में हाईस्कूल पास करना अपने आप में बड़ी उपलब्धि थी। वर्ष 1984 में इंटरमीडिएट उत्तीर्ण किया। इसके बाद परिवार में शादी की चिंता शुरू हो गई और इंटर पास करते ही उनका विवाह हो गया।


विवाह के बाद उन्होंने पूरी तरह गृहस्थ जीवन को अपना लिया। परिवार की जिम्मेदारियों के साथ बच्चों की परवरिश, ससुर की देखभाल और घर के अन्य सदस्यों की जिम्मेदारियां निभाती रहीं। इसी बीच उनके तीन बच्चे हुए। लगभग दस वर्ष तक पढ़ाई से उनका नाता टूट गया।

चार बच्चों की मां बनीं तो फिर थामी किताब

शादी और पढ़ाई के बीच करीब दस वर्ष के लंबे अंतराल के बाद वर्ष 1990 के दशक में उन्होंने दोबारा पढ़ाई शुरू करने का निर्णय लिया। परिस्थितियां आसान नहीं थीं। एक तरफ परिवार, दूसरी तरफ बच्चे और घर की जिम्मेदारियां, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।


वर्ष 1996 में स्नातक, 1998 में बीएड, 1999 में प्राचीन इतिहास से परास्नातक, 2000 में एमएड और 2003 में पीएचडी की उपाधि हासिल की। इसके बाद उनकी मेहनत ने उन्हें कॉलेज की कक्षा तक पहुंचा दिया।


गाजीपुर के एक पीजी कॉलेज के बीएड विभाग में उन्हें असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में काम करने का अवसर मिला। करीब एक वर्ष तक उन्होंने अध्यापन किया। इसी दौरान विशिष्ट बीटीसी-2004 की भर्ती निकली। मेरिट अच्छी होने के कारण उनका चयन हो गया। परिवार के साथ रहकर नौकरी करने और अपने बच्चों की देखभाल को प्राथमिकता देते हुए उन्होंने कॉलेज की नौकरी से इस्तीफा दिया और बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षक के रूप में अपनी नई पारी शुरू की।


एक नहीं, चार विषयों में हासिल की पीजी की डिग्री


डॉ. उषा सिंह की शैक्षणिक यात्रा यहीं नहीं रुकी। उन्होंने व्यक्तिगत अध्ययन जारी रखते हुए प्राचीन इतिहास, शिक्षा शास्त्र, राजनीति विज्ञान और हिंदी जैसे विषयों में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की।


उनका मानना है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती। इंसान के भीतर यदि सीखने की इच्छा हो तो परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, रास्ते खुद बनते चले जाते हैं।


पति को कैंसर हुआ, जिंदगी में आया सबसे कठिन दौर


डॉ. उषा सिंह की जिंदगी में वर्ष 2013 सबसे कठिन दौर लेकर आया। उनके पति जीतेन्द्र सिंह कैंसर से पीड़ित हो गए। एक तरफ पति के इलाज की चिंता और दूसरी तरफ बच्चों की पढ़ाई व परिवार की जिम्मेदारी। वह पति के इलाज के लिए जौनपुर से वाराणसी, लखनऊ और मुंबई तक दौड़ती रहीं।


इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद वह अपने पति को बचा नहीं सकीं।


पति के निधन के बाद परिवार का पूरा बोझ उनके कंधों पर आ गया। लेकिन उन्होंने परिस्थितियों के सामने घुटने टेकने के बजाय अपने दर्द को भीतर समेटकर बच्चों के भविष्य को अपनी जिंदगी का मकसद बना लिया।


बच्चों को बनाया काबिल, बेटियों ने बढ़ाया मां का मान


डॉ. उषा सिंह कहती हैं कि पति के निधन के बाद उनके सामने सबसे बड़ा सवाल बच्चों के भविष्य का था। उन्होंने अपना दर्द सीने में दफन किया और पूरी ताकत बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में लगा दी।


आज उनकी मेहनत का परिणाम सामने है। उनकी बड़ी बेटी शुभ्रा सिंह बैंक मैनेजर हैं। दूसरी बेटी शिप्रा सिंह बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षक हैं। तीसरी बेटी शिल्पा सिंह अहमदाबाद, गुजरात स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ प्लाज्मा रिसर्च सेंटर में शोध कर रही हैं। बेटा रणवीर प्रताप सिंह यूपीएससी की तैयारी कर रहा है। वह अपनी दो बेटियों की शादी भी कर चुकी हैं।


यानी जिस मां ने खुद परिस्थितियों से लड़कर शिक्षा की राह पकड़ी, उसी ने अपने बच्चों के हाथों में भी किताबें थमा दीं।


अब सरकारी स्कूल को बनाया अपनी अगली मंजिल


अपने परिवार और करियर को संवारने के बाद डॉ. उषा सिंह ने अपना पूरा ध्यान विद्यालय के बच्चों के भविष्य पर केंद्रित कर दिया। सिरकोनी ब्लॉक के प्राथमिक विद्यालय चकताली की कमान जब उन्हें मिली तो विद्यालय की स्थिति अच्छी नहीं थी। भवन की हालत जर्जर थी और बच्चों की संख्या भी कम थी।


उन्होंने गांव में जाकर अभिभावकों से बातचीत की। पता चला कि आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के बावजूद कई परिवार मजबूरी में अपने बच्चों का नाम कॉन्वेंट स्कूलों में लिखवा रहे थे। डॉ. उषा सिंह ने समस्या की जड़ को समझा और तय किया कि सरकारी स्कूल को ही ऐसा बनाया जाए कि अभिभावकों को अपने बच्चों को कहीं और भेजने की जरूरत न पड़े।


कॉन्वेंट से नाम कटवाकर सरकारी स्कूल पहुंचने लगे बच्चे


उन्होंने विद्यालय को इंग्लिश मीडियम कराया। विद्यालय भवन की रंगाई-पुताई कराकर उसे आकर्षक बनाया। समुदाय के सहयोग से डेस्क-बेंच, टाई-बेल्ट और स्मार्ट क्लास जैसी सुविधाओं की व्यवस्था कराई। शिक्षकों की टीम को साथ लेकर बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने पर जोर दिया।


नतीजा यह हुआ कि महज दो वर्षों के भीतर तस्वीर बदलने लगी। जिन अभिभावकों ने अपने बच्चों का नाम कॉन्वेंट स्कूलों में लिखाया था, वही अभिभावक अब वहां से नाम कटवाकर प्राथमिक विद्यालय चकताली में दाखिला कराने लगे।


जो विद्यालय कभी कम छात्र संख्या और बदहाल व्यवस्थाओं के लिए जाना जाता था, वही आज अपनी अलग पहचान बना चुका है।


‘सरकारी स्कूल भी किसी से कम नहीं’ का दिया संदेश


डॉ. उषा सिंह की कहानी सिर्फ एक महिला के संघर्ष और सफलता की कहानी नहीं है। यह उस सोच को भी चुनौती देती है कि सरकारी विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल सकती।


उन्होंने अपने काम से साबित किया कि यदि प्रधानाध्यापक और शिक्षक ठान लें तो सरकारी स्कूल भी कॉन्वेंट स्कूलों को चुनौती दे सकता है।


एक ओर उन्होंने सामाजिक बंधनों के बीच अपना जीवन शुरू किया, परिवार संभाला, पति को खोया, अकेले बच्चों की जिम्मेदारी उठाई और फिर भी शिक्षा की मशाल बुझने नहीं दी। दूसरी ओर उसी शिक्षा को हथियार बनाकर आज वह सैकड़ों बच्चों के भविष्य को रोशन करने में जुटी हैं।


डॉ. उषा सिंह की जिंदगी का संदेश साफ है—परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन हों, अगर इरादा मजबूत हो तो रुकी हुई जिंदगी भी फिर से रफ्तार पकड़ सकती है और एक महिला सिर्फ अपना नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज का भविष्य बदल सकती है।

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  1. आप सच में मिशाल हैं ma'am आप ने जो किया काबिले तारीफ़ हैं, आपको देखकर समाज और हम सभी माहिलाओ को सिखाना चाहिए पर इस समय लोग लोगों कि बुराईयां करने और खोजने में परेशान हैं पर मै आपको प्रणाम करती हूँ और आपसे कुछ सीखने की कोशिश करूँगी 🙏🙏

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